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भाई-बहन

खीरा छुड़वाकर माँ ने दिलाया भाई का लंड! - घर की बातें!

17 मिनट पढ़ें

First Time Sex Antarvasna : माँ ने कहा : खीरा-गाजर छोड़ो, भाई का लो मूसल लंड! फिर भाई ने शॉवर में नंगी बहन की टाइट चूत फाड़ी! आईने के सामने फिर से चुदी माँ! XXX

भाग एक

"सोते भाई का दीदी ने थामा लंड! - घर की बातें!"

में आपने पढ़ा :-

माँ

ने

मेरा

हाथ

अपने

स्तनों

पर

रखा,

खुद

मेरे

लंड

को

सहलाने

लगीं।

दस-बारह

मिनट

होठों

पर

होठ

रहे।

फिर

मैं

नीचे

गया,

क्लिट

मुँह

में

ली।

माँ

बोलीं,

“आह

बेटा,

ज़रा

धीरे…”

उस

आवाज़

ने

जोश

और

बढ़ा

दिया।

पूरी

चूत

मुँह

में

लेकर

चाटने

लगा।

माँ

उछल

पड़ीं।

“आह…

आह…

बहुत

मज़ा

आ

रहा

है।

और

चूस…

पूरा

रस

पी

जा।

सालों

बाद

मेरी

चूत

इतना

पानी

छोड़

रही

है।”

चाटने

के

बाद

दोनों

टाँगों

के

बीच

बैठ

गया।

सुपाड़ा

चूत

के

मुँह

पर

रखा।

माँ

ने

आँखें

बंद

कर

लीं,

होंठ

भींच

लिए,

तकिया

कानों

पर

दबा

लिया।

हरी

झंडी

थी।

एक

झटका

मारा

-

चाटने

से

चूत

इतनी

गीली

थी

कि

लंड

एक

ही

धक्के

में

पूरा

समा

गया।

धीमे

धक्के

शुरू

किए।

फिर

ऊपर

आकर

होठ

चूसे,

रफ़्तार

बढ़ाई।

कुछ

देर

बाद

झड़

गया।

साइड

में

लेट

गया।

माँ

ने

छत

की

तरफ़

देखते

हुए

कहा,

“आज

बहुत

सालों

बाद

मुझे

चुदाई

का

आनंद

मिला

है।”

“माँ,

मैंने

अपना

पानी

तेरी

चूत

में

छोड़

दिया

है।

कहीं

तू

प्रेग्नेंट

हो

गई

तो?”

माँ

हँसी,

बालों

में

उँगली

फेरी।

“अरे

बुद्धू,

मेरा

अठारह

साल

पहले

ऑपरेशन

हो

गया

है।”

“हाँ

तो

फिर

ठीक।

अब

जब

भी

तुझे

चोदूँगा,

पानी

तेरे

अंदर

ही

छोडूँगा।”

हम

दोनों

एक

दूसरे

को

गले

लगाकर

नंगे

सो

गए।

सुबह

माँ

पुकार

रही

थीं।

मैंने

जवाब

नहीं

दिया,

तकिया

चेहरे

पर

रख

लिया।

माँ

को

याद

नहीं

रहा

कि

मैं

पूरा

नंगा

सोया

था।

उन्होंने

श्रुति

को

भेज

दिया

जगाने।

श्रुति

कमरे

में

आईं

-

और

उनका

मुँह

खुला

रह

गया।

मेरा

लंड

पूरा

खड़ा

था।

वो

कुछ

देर

खड़ी

देखती

रहीं।

फिर

हाथ

बढ़ाया,

लंड

पकड़ा,

धीरे-धीरे

ऊपर-नीचे

करने

लगीं।

मज़ा

आने

लगा।

मैंने

आँखें

हल्की

खोलीं

-

श्रुति

अपना

मुँह

लंड

के

करीब

ले

आई

थीं।

उसी

पल

माँ

कमरे

में

आ

गईं।

श्रुति

के

कंधे

पर

हाथ

रखा।

श्रुति

झट

से

मुड़ीं

और

बाहर

चली

गईं।

माँ

ने

मुझे

कंबल

से

ढक

दिया

और

कमरे

से

निकलीं।

हॉल

में

आवाज़ें

आने

लगीं।

माँ

पूछ

रही

थीं,

“क्या

हुआ

श्रुति?”

श्रुति

की

आवाज़

काँप

रही

थी,

“माँ,

तूने

देखा?

भाई

कैसे

पूरा

नंगा

सो

रहा

था?”

“हाँ,

वो

तो

रोज़

ऐसे

ही

सोता

है।”

“कल

रात

तो

वो

तुम्हारे

साथ

सोया

था

ना?”

“हाँ।

लेकिन

सुबह

उठकर

अपने

कमरे

चला

गया

था।”

बातें

और

गहराई

में

जाने

लगीं।

मैं

बाथरूम

का

दरवाज़ा

खोलने

ही

वाला

था

कि

रुक

गया।

दीवार

के

उस

पार

माँ

और

बेटी

वही

बात

कर

रही

थीं,

जो

इस

घर

को

हमेशा

के

लिए

बदलने

वाली

थी।

अब आगे की कहानी :-

“हाँ। लेकिन सुबह उठकर अपने कमरे चला गया था।”

“तो वो तुम्हारे साथ नंगा नहीं सोता?”

माँ ने चाय की केतली चूल्हे पर रखी। आवाज़ बहुत सामान्य थी, जैसे रोटी के आटे की बात हो। “वो मेरे कमरे में कभी-कभी नंगा सोता है।”

“माँ, तुझे उसे रोकना चाहिए।”

“मैं क्यों उसे रोकूँ?”

“तूने देखा नहीं उसका वो कैसे खड़ा था?” (यहाँ से माँ बेटी का वही पुराना खुलापन शुरू हो गया था जिसके बारे में मुझे बाद में पता चला!)

“क्या खड़ा था?”

श्रुति ने आवाज़ दबाई, फिर भी शब्दों में नसों की गरम आह थी। “अरे वो माँ… समझा कर।”

“अरे क्या समझाऊँ? और क्या खड़ा था?”

“अरे उसका डिक।”

“माँ वो क्या होता है?”

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“अरे माँ, वो मर्दों का होता है ना?”

“क्या होता है?”

“अरे माँ… उसका लंड।”

चाय की केतली से भाप निकली। माँ कुछ देर चुप रहीं। फिर उनकी आवाज़ में हल्की हँसी थी, शर्म नहीं।

“ओह। तू भी तो बड़े ध्यान से उसे निहार रही थी। और हाँ, मैं जल्दी आ गई। वरना तू तो उसका लंड मुँह में लेकर चूसने वाली थी। झूठ न बोलना।”

श्रुति चुप हो गई। कप की तश्तरी खनकी।

“उसका लंड है ही इतना सुंदर कि कोई भी लड़की उससे चुदना अपना सौभाग्य समझेगी।”

“तुझे वो सौभाग्य चाहिए?”

“कैसी बात करती हो माँ? वो मेरा भाई है।”

माँ की आवाज़ और पास आ गई, जैसे कुर्सी खींचकर बेटी के सामने बैठ गई हों।

“कल जब तू नहा रही थी तो दूसरा गेट लॉक करना भूल गई थी। वो बाथरूम का दरवाज़ा खोलकर तेरे शरीर को निहार रहा था। और अपने हाथ से तेरे नाम की मुठ मार रहा था।”

“माँ… वो मेरे नाम की मुठ मार रहा था और आप देख रही थीं?”

“तो क्या करती? उसे बोलती - जा, चोद तुझे… या फिर मुझे?”

“क्या माँ, तू भी कैसी बात कर रही है।”

“क्यों, तुझे उसका लंड अच्छा नहीं लगा?”

श्रुति ने जवाब देते-देतें साँस ली। “ऐसी बात नहीं है। और वो बहुत बड़ा है।”

“तुझे बड़ा पसंद नहीं है?”

“ऐसी भी कोई बात नहीं है।”

“पसंद है तो फिर प्रॉब्लम क्या है?”

“वो मेरा भाई है।”

माँ ने प्याला टेबल पर रखा। आवाज़ धीमी हो गई, लेकिन हर शब्द कमरे तक आया।

“अच्छा, वो घर का है इसलिए प्रॉब्लम है। बाहर का होता तो प्रॉब्लम नहीं थी। एक बात बता - तूने अब तक कितने लंड देखे हैं?”

“माँ, आप भी क्या पूछती हो?”

“क्यों, तेरा कोई बॉयफ्रेंड नहीं है?”

“हाँ… था एक बॉयफ्रेंड।”

“तूने उसके साथ कभी सेक्स नहीं किया?”

“एक-दो बार ट्राई किया था। लेकिन उसका तो किसिंग में ही पानी गिर जाता था।”

“ओह। तो तू अभी तक वर्जिन है?” यह Full Family xxx की Antarvasana Hindi Sex Kahani आप गरम कहानी डॉट कॉम में पढ़ रहे है!

श्रुति देर तक चुप रही। फिर बहुत धीमे बोली, “वर्जिन तो नहीं। लेकिन हाँ… आज तक खीरे और गाजर से काम चलाया है।”

बिस्तर पर मेरी साँस रुक गई। खीरा। गाजर। वही शब्द जो बाद में आशा के मुँह से भी निकले।

उस सुबह पहली बार घर की औरतों का पुराना खेल मेरे कान में गिरा - माँ और बेटियाँ एक दूसरे से कुछ छिपाती नहीं थीं। रात की दबी आहें सिर्फ़ बातें नहीं थीं।

माँ ने कहा, “जब घर में इतना मूसल लंड है तो खीरे और गाजर का प्रयोग क्यों?”

“माँ, क्या हो गया है तुझे आज? तू कैसी बातें कर रही है? तेरी बुद्धि भ्रष्ट हो गई है।”

“एक बार ये मूसल लंड का मज़ा चख लेगी ना, फिर जीवन का हर सुख इसके सामने छोटा लगेगा।”

“माँ, अगर किसी को पता चला तो हमारी बहुत बदनामी होगी।”

“कौन जाकर बाहर वालों को बताएगा? घर की बात घर में ही रहेगी। कोई टेंशन भी नहीं। कल जब तेरी शादी होगी तो कह सकते हैं हमारी लड़की का घर के बाहर वालों के साथ कोई गलत संबंध नहीं है। जो संबंध है वो घरवालों के साथ है।”

श्रुति की आवाज़ काँपी, “माँ… पर ये सब कैसे संभव होगा?”

“अभी तुझे बड़ी जल्दी पड़ी है? मैं कुछ प्लान बनाती हूँ।”

“माँ, पर सैंडी का लंड बहुत बड़ा और मोटा भी है।”

“हाँ, पता है मुझे। मैंने कई बार देखा है। जब भी रविवार के दिन उसे जगाने जाती हूँ तो वो एक नाग की तरह फन फैलाए खड़ा होता है। एक बार तो मैंने उसे अपने हाथ से पकड़ा था। बहुत मज़ा भी आया था।”

“फिर क्या किया तुमने?”

“कुछ नहीं। दस-बारह मिनट ऊपर-नीचे करने के बाद उसका पानी निकल गया। और मैं वहाँ से हट गई।”

“दस-पंद्रह मिनट?”

“हाँ बाबा, दस-पंद्रह मिनट।”

बातें चलती रहीं। मैंने महसूस किया श्रुति की साँस बदल गई है। माँ ने वो भी देख लिया।

“बातों-बातों में ही तेरी चूत गीली हो गई।”

श्रुति ने इनकार नहीं किया। कपड़े की हल्की सरसराहट आई - हाथ नीचे गया होगा।

“माँ… ये गोआ का ट्रिप। जब हम रिटर्न आएँगे, फिर भाई के इस मूसल लंड से मेरी चूत का उद्घाटन करेंगे।”

माँ ने सहमति में कुछ कहा, फिर आदेश की तरह बोलीं, “ठीक है। अब जा, पैंटी बदल ले। नहीं तो इसी गंदी पैंटी में दिन भर घूमेगी। और हाँ, श्रेया को भी उठा। नहीं तो सोती रहेगी।”

कुर्सियाँ खिसकीं। मैं और लेट नहीं सकता था। पेशाब भी लग चुका था। बिस्तर से उठा, बाथरूम का दरवाज़ा खोला — और अंदर कदम रखते ही सब भूल गया।

श्रेया दीदी पूरी नंगी शॉवर के नीचे खड़ी थीं। आँखें बंद। एक उँगली अपनी चूत में अंदर-बाहर हो रही थी। फिगर तीस-छब्बीस-बत्तीस। माँ और श्रुति से भी गोरी। गुलाबी निपल पानी में चमक रहे थे।

उन्हें पता भी नहीं चला कि दरवाज़ा खुला है। वो अपने काम में इतनी डूबी थीं जैसे रात की कोई याद दोहरा रही हों। यह Parivarik Group Sex की Desi Sex वाली Nonveg Hot Sex Story in Hindi आप

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मैं पेशाब भूल गया। धीरे से उनके पीछे खड़ा हो गया। खड़ा लंड पीछे से उनकी गाँड से घिसता हुआ चूत तक ले गया। दीदी एकदम मुड़ने लगीं। मैंने छाती उनकी पीठ से सटा दी, दोनों हाथ आगे लाकर स्तन मसलने लगा।

दीदी के हाथ पीछे आए और मेरे लंड को पकड़ लिया। उन्होंने सिर मेरे कंधे पर रख दिया। कोई शब्द नहीं निकला। सिर्फ़ पानी और साँस।

मैंने आज तक ऐसे गुलाबी निपल नहीं देखे थे। स्तन दोनों हथेलियों में पूरे समा गए। दीदी लंड सहला रही थीं, मैं निपल मरोड़ रहा था। थोड़ी देर बाद उन्होंने आँखें खोलीं।

मैंने होंठ उनके होंठों पर रख दिए। दीदी चूसने लगीं। साथ ही लंड अपनी चूत पर रगड़ने लगीं।

मैंने शॉवर बंद किया। उन्हें नंगा ही गोद में उठाया और अपने कमरे ले आया। बिस्तर पर रखते ही दीदी ने लंड पकड़कर मुँह में ले लिया। मैं उल्टा लेटा, मुँह उनकी चूत पर रख दिया।

चूत बहुत छोटी थी। क्लिट गुलाबी पंखुड़ी जैसी नरम। चाटते ही दीदी की कमर उठी। वो प्यार से, धीरे-धीरे लंड चूस रही थीं - भूख थी, जल्दबाज़ी नहीं।

थोड़ी देर बाद उन्होंने लंड मुँह से निकाला। आवाज़ काँप रही थी।

“सैंडी, अब मुझे और मत तड़पा। अब मुझे अपने लंड से तृप्त कर दे। प्लीज़। जल्दी मुझे चोद दे।”

“दीदी, इतनी भी क्या जल्दी है।”

“बहुत दिनों से तेरे लंड से चुदना चाहती थी। आज अवसर मिला है। इससे पहले कि माँ और श्रुति आकर रंग में भंग डालें, डाल दे अपना ये साढ़े आठ इंच मेरी चूत में। बुझा दे मेरी प्यास।”

“ठीक है दीदी। आज तुम्हारी चूत भी तृप्त कर देता हूँ।”

“जल्दी कर। मेरे शरीर में कुछ-कुछ हो रहा है।”

“आवाज़ काबू में रखना। मेरा लंड बड़ा और मोटा है। ये तुम्हारी पहली चुदाई है। दर्द होगा।”

दीदी ने मेरे बाल पकड़े। “मैं सब झेल लूँगी। तू बस डाल। जी भरके चोद। ऐसा चोदना कि मेरी बाईस साल की प्यास खत्म हो जाए।”

“दीदी, ये प्यास कभी खत्म नहीं होती।”

“अब डाल यार। चोद मुझे। जीवन का आनंद लेने दे।”

मैंने लंड पर थूक लगाया, सुपाड़ा चूत के मुँह पर रखा। मुँह इतना छोटा था कि लंड फिसल गया। दोनों मध्यमा से होंठ फैलाए, फिर सिर अंदर फँसाया। दीदी कसमासाईं, हल्की चीख निकली। समझ गया अगले धक्के पर आवाज़ फटेगी।

मैंने होंठ उनके होंठों पर रख दिए और एक झटका मारा। लंड उनकी चूत चीरता हुआ भीतर समा गया।

आँखों से आँसू बह निकले। मैं हिला नहीं। उसी पोज़ में पड़ा रहा। जीभ से उनकी जीभ चाटी। जब दीदी का साथ लौटा, तब धीरे-धीरे आगे-पीछे शुरू किया। दर्द उतरने लगा। दीदी की गाँड उठ-उठकर जवाब देने लगी।

“हाँ सैंडी… और अंदर डाल… फाड़ दे मेरी चूत को… रोज़ रात ये मुझे सोने नहीं देती… फाड़ दे इसे… ज़िंदगी का असली सुख दे।”

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रफ़्तार बढ़ाई, बिस्तर की आवाज़ कम रखी। बारह-पंद्रह मिनट तक वही लय रही। शरीर पसीने से भीग गए। एक साथ पिचकारी छूटी - मेरा वीर्य उनकी चूत में, उनका पानी मेरी जाँघों पर। मैं धीमे धक्के करता रहा। दीदी मेरी छाती चूम रही थीं।

साइड में लेटा। थोड़ी देर खामोशी रही।

दीदी ने धीमे पूछा, “आज तूने मुझे ज़िंदगी का असली सुख दिया है। बहुत मज़ा आया तेरे साथ।”

“मेरे से पहले किसके साथ सेक्स किया है आपने?”

“ग्रेजुएशन के फ़ाइनल ईयर में एक बूढ़े प्रोफ़ेसर ने अटेंडेंस के लिए घर बुलाया था। उसने चुदाने की बहुत कोशिश की। लेकिन उसके लंड में इतनी ताकत नहीं थी।”

“दीदी, आपकी चूत बहुत छोटी है। जितनी चूतें देखी हैं, सबसे टाइट आपकी थी।”

दीदी ने करवट बदली। निगाह मेरी आँखों में थी। “क्या मेरी चूत माँ की चूत से भी छोटी है?”

“मुझे क्या पता माँ की चूत के बारे में।”

“झूठ न बोल। ये माँ की पैंटी और नाइटी यहाँ क्या कर रही हैं। कल रात माँ तेरे कमरे में सोई थी। तुम दोनों ने जो चुदाई की, वो मैंने अपनी आँखों से देखी है।”

खून ठंडा हुआ, फिर गरम। “दीदी, प्लीज़, किसी को मत बताना।”

“मैंने पिछले हफ़्ते माँ को तेरा लंड हिलाते हुए देखा था। उस दिन से मेरे दिल में तेरे लंड से चुदने की चाह जगी।

कल शाम को भी तू माँ को किचन में खड़े-खड़े चोदने की तैयारी कर चुका था। आखिरी पल मैंने खाने के लिए पुकारा, तू शॉर्ट्स पहनकर सलाद लेकर हॉल में आ गया।”

“तुझे ये सब कैसे पता? तू तो डाइनिंग टेबल पर बैठी थी।”

“मैं उस वक्त किचन तक आकर वापस गई। तुम दोनों को नहीं बताना चाहती थी कि देख लिया है। उस वक्त भी मैंने तेरा लंड देख लिया था। तू उसे माँ की चूत में डालने वाला था।”

“थैंक्स अ लॉट दीदी। और हाँ… कल रात मैंने माँ को पहली बार चोदा है। मुझे और माँ को बहुत मज़ा आया।”

“तेरा तो पता नहीं। लेकिन माँ को बहुत मज़ा आया होगा। इतना बड़ा और मोटा लंड अपनी चूत में लेकर।”

बात करते-करते दीदी का हाथ फिर लंड पर था। लंड खड़ा हो गया।

“ले, तेरा हथियार फिर खड़ा हो गया है। जा, अब चोद माँ को।”

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“माँ तो श्रुति के साथ हॉल में बैठी बातें कर रही है। क्यों न हम दोनों एक और बार?”

“नहीं बाबा। पिछली बार ही मैं दो बार झड़ चुकी हूँ। अब तू मेरी जान निकाल देगा।”

“आराम से करूँगा।”

“नहीं। मुझे शॉपिंग के लिए जाना है।”

दीदी उठने लगीं। मैंने हाथ पकड़कर वापस लिटा दिया, होंठ चूसे। पहले उन्होंने धक्का दिया - दिखावे का।

दो मिनट बाद बालों में उँगली फिरने लगी। हरी झंडी थी।

लंड फिर चूत पर सेट किया, एक झटके में भीतर किया, और पूरी ताकत से चोदने लगा। कभी गर्दन, कभी स्तन, कभी होंठ। बीस-पच्चीस मिनट कमर तोड़ चुदाई की। दोनों फिर झड़ गए।

दीदी अब उठ भी नहीं पा रही थीं। मैं उठा, उन्हें गोद में लेकर बाथरूम ले गया, गरम पानी का शॉवर खोल दिया। दीदी पानी के नीचे खड़ी अपनी चूत सेक रही थीं।

कमरे में लौटा तो चादर देखकर रुक गया। पूरी चादर खून से भीगी थी। साथ में एक चिपचिपा सफ़ेद धब्बा फैला हुआ था। मैंने चादर झट से निकाली, दूसरी बिछा दी।

बाथरूम गया तो दीदी जा चुकी थीं।

मन में एक बात बैठ गई - श्रेया को मैं साधारण लड़की समझता था। वो तो श्रुति से चार कदम आगे निकली हुई थीं। और माँ के साथ जो खुलपन घर में पहले से चल रहा था, श्रेया उसका हिस्सा थीं। पूरा राज़ अभी बाकी था।

वो राज़ दोपहर में आशा (हमारी नौकरानी) के हाथों खुला।

जल्दी नहाकर डाइनिंग टेबल पर पहुँचा। माँ, श्रुति, श्रेया तीनों बैठी थीं। श्रेया की चाल अभी भारी थी। माँ की निगाह एक पल मेरे चेहरे पर गई, फिर श्रेया की गर्दन पर - वहाँ हल्का निशान था। कुछ नहीं पूछा।

“उठ गया बेटा।”

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श्रुति ने कहा, “उठ गया तू।”

“नहीं, सो रहा हूँ। नींद में यहाँ तक चलकर आया हूँ।”

माँ उठीं, “तू बैठ, मैं नाश्ता लाती हूँ।”

श्रेया ने मुस्कुराते हुए कहा, “हाँ माँ, पाँच-छह अंडों का ऑमलेट बना देना। आजकल आपका बेटा बहुत मेहनत करता है… जिम में।”

“जिम में मेहनत करने से ही ऐसी बॉडी बनती है।”

श्रेया ने माँ की तरफ़ देखा, “हाँ-हाँ, पता है तू कहाँ-कहाँ मेहनत करता है। है ना माँ?”

माँ ने बात काटी, “तुम दोनों लड़कियाँ तैयार हो जाओ। शॉपिंग के लिए जाना है ना?”

“हाँ, गोआ की टिकट भी बुक करनी है।”

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दोनों कमरे में गईं। थोड़ी देर में कपड़े बदलकर माँ से पैसे माँगने लगीं। माँ ने दस हज़ार दिए। दरवाज़ा बंद हुआ। घर में सिर्फ़ माँ और मैं रह गए।

मैं माँ के बेडरूम में जाकर बिस्तर पर लेट गया। बाथरूम से पानी की आवाज़ आ रही थी।

थोड़ी देर बाद माँ निकलीं - शरीर पर सिर्फ़ एक तौलिया। तौलिया न स्तन ढक रहा था, न गाँड। वो ड्रेसिंग टेबल के सामने बाल सँवार रही थीं। मैं पीछे खड़ा हो गया। माँ आईने में मुस्कुराईं।

“अब तो शाम तक हम दोनों अकेले हैं।”

“माँ, आज तू घर में केवल पैंटी पहनकर घूमना।”

“आशा काम करने आने वाली है थोड़ी देर में।”

“ओह नो।”

“टेंशन न ले। वो ढाई बजे तक चली जाएगी। फिर हम दोनों एंजॉय करेंगे।”

मैंने तौलिये की गाँठ खोल दी। तौलिया पैरों में गिर गया। शॉर्ट्स की डोरी खींची।

खड़ा लंड माँ की गाँड से छुआ। पीछे से गले लगाया, आईने में देखते हुए दोनों स्तन दबाने लगा, लंड पीछे से चूत पर रगड़ने लगा। माँ ने हाथ टेबल पर रख दिए और झुक गईं। पीछे से चूत साफ़ दिख रही थी।

लंड पकड़ा, मुँह पर रखा, एक झटका मारा - पूरा भीतर चला गया।

हम दोनों आईने में अपनी चुदाई देख रहे थे। दस-पंद्रह मिनट स्तन मसले, लंड जड़ तक धकेला। अंत में साथ झड़ गए। लंड और चूत का पानी माँ की टाँगों से होता हुआ फ़र्श पर गिरा।

उसी पोज़ में सिर उनकी पीठ पर रखा था कि मुख्य द्वार की घंटी बज गई।

“आशा आ गई होगी।”

“मैं अपने कमरे जाता हूँ।”

“जल्दी जा। कुछ कपड़े पहन ले। नहीं तो ऐसे ही नंगा सो जाएगा।”

“वैसे भी आशा के जाने के बाद कपड़े उतारने ही हैं।”

माँ मुड़ीं, “अब क्या, आशा के भी कपड़े उतारेगा?”

“नॉट माई टेस्ट।”

“ठीक है, जा जल्दी।”

मैं अपने कमरे गया। माँ ने वन-पीस नाइटी पहनकर दरवाज़ा खोला। सामने कामवाली आशा खड़ी थी। मैं बिस्तर पर लेट गया। नींद और हवस के बीच आँख लगी।

कुछ देर बाद लंड पर किसी के छूने का अहसास हुआ। आँख हल्की खोली - और अचरज में पड़ गया।

आशा मेरे बिस्तर पर बैठी थी। कमरे के दरवाज़े की तरफ़ देख-देखकर मेरे लंड को सहला रही थी। पूरा ध्यान इस बात पर था कि बाहर से कोई न आ जाए।

मैंने आँख फिर बंद कर ली। देखना था आगे वो क्या करती है!

आगे की कहानी : "जल्द ही.."

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यह कहानी पूरी तरह काल्पनिक है। इसमें दिखाए गए पात्र और घटनाएँ वास्तविक नहीं हैं। साइट केवल 18 वर्ष या अधिक आयु के पाठकों के लिए है।

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