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मैंने अपनी दादी को पोर्न मूवीज की तरह चोदा

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मेरा नाम प्रांशु यादव है। उम्र सत्ताईस साल। कद पाँच फुट छह इंच। और जो चीज़ मुझे गली के बाकी लड़कों से अलग बनाती थी, वो थी मेरे लंड का साइज़ — नौ पॉइंट चार इंच, मोटा, भारी, और जब खड़ा होता था तो पैंट के अंदर एक अलग ही हलचल मच जाती थी।

घर में सब यही कहते थे कि प्रांशु तो अभी शादी के लायक नहीं, अभी तो पढ़ाई करे। और मैं भी यही मानकर चल रहा था।

लेकिन भगवान जाने कब से एक ऐसी औरत के ख्यालों में घूम रहा था, जिसे दुनिया “दादी माँ” कहकर बुलाती थी, और जिसे मैं अपने मन के अंदर “नीलम” कहने लगा था।

नीलम यादव। मेरी दादी। पैंसठ साल की। और जब लोग सुनते थे कि पैंसठ साल की है, तो उनके दिमाग में एक झुकी कमर, लटकी चूचियाँ और फीकी शक्ल वाली बूढ़ी औरत की तस्वीर बनती थी।

लेकिन जो मेरी दादी को देख लेता था, वो फिर कभी ये नहीं कहता था कि वो बूढ़ी है। नीलम यादव पैंसठ की थी, हाँ — उम्र से, दस्तावेज़ों से, आधार कार्ड से। लेकिन जिस्म से वो उस उम्र की नहीं लगती थी, कभी नहीं लगी।

उसके चूचियों का साइज़ 38 इंच का था — भारी, गोल, ब्लाउज़ के अंदर तंग बैठी, ज़रा सी हिलने पर भी हिलती हुई। कमर चौंतीस की — अब भी उतनी ही, जितनी शायद जवानी में थी।

और गांड बयालीस की — चौड़ी, गोल, भारी, साड़ी के पल्लू के नीचे दबी हुई, जो चलते वक़्त एक अलग ही लय में हिलती थी। पैंसठ साल की औरत और बयालीस की गांड — ये जोड़ी खुद ही किसी फिल्म का पोस्टर लगती थी।

मैं बचपन से उनके साथ ही रहा हूँ। पापा-मम्मी शहर में नौकरी करते थे, और मुझे पढ़ाई के लिए गाँव में दादा-दादी के पास छोड़ गए थे। तब दादाजी ज़िंदा थे।

दादाजी का देहांत हुआ, तो मैं ग्यारहवीं में था। उसके बाद दादी और मैं, दो लोग, उस बड़े से घर में। सुबह की चाय से लेकर रात की रोटी तक, सब वही बनाती थीं। मेरे कपड़े वही धोती थीं। मेरे बाल वही काटती थीं।

मेरे बुखार में वही सिर पर पानी की पट्टी रखती थीं। मेरे लिए वो “दादी माँ” थीं — बस इतना ही। लेकिन जैसे-जैसे मैं बड़ा होता गया, मेरी नज़र बदलने लगी।

बदलाव की शुरुआत एक गर्मी की दोपहर से हुई। तेरह बजे का समय था, लू चल रही थी। दादी ने साड़ी की कमर खोल दी थी और बस ब्लाउज़ और पेटीकोट में आँगन में बैठी थीं, आँचल से हवा कर रही थीं।

ब्लाउज़ की डोरी ढीली थी, और साइड से उनकी चूची का एक हिस्सा, गोलाई में, बाहर झाँक रहा था। मैं चारपाई पर लेटा-लेटा किताब पढ़ रहा था, लेकिन पढ़ाई कब बंद हो गई, पता नहीं चला।

मेरी नज़र उस गोलाई पर टिक गई। मन में पहली बार एक बेईमान सा ख्याल आया — “ये दादी हैं या औरत?” और उस दिन के बाद वो ख्याल कभी नहीं गया। वो धीरे-धीरे एक बीमारी की तरह बढ़ता गया।

फिर आया वो दिन जब नहाने की जगह बदली। पुराना बाथरूम टूट गया, और नया बनने तक हमने आँगन के नल के नीचे ही नहाना शुरू किया — दादी ने एक टाट का पर्दा लगा दिया था।

लेकिन वो पर्दा कभी-कभी खिसक जाता था। और उस खिसके हुए पर्दे की खाई से मैंने पहली बार देखा — उनकी चूचियाँ, पानी में भीगी, भारी, नीचे को झुकी हुई, और उन पर गहरे भूरे निपल्स, जो पानी के छींटों से सख़्त हो गए थे।

उस वक़्त मेरे लंड ने पैंट के अंदर ऐसी हलचल मचाई कि मुझे अपनी टाँगें दबाकर खड़ा होना पड़ा। और जब वो नहाकर बाहर आतीं, तो गीली साड़ी उनके जिस्म से चिपकी हुई, कमर से नीचे उनकी बयालीस की गांड का पूरा नक्शा बना देती थी।

पानी की बूँदें उनकी गर्दन से नीचे बहतीं, और उनकी चूचियों के बीच की दरार में जाकर ग़ायब हो जातीं।

रात को जब सब सो जाते, मैं अपने कमरे में दरवाज़ा बंद करके उनकी याद करता। साड़ी वाली दादी, ब्लाउज़ वाली दादी, आँचल वाली दादी, गीली दादी, पानी में भीगी दादी।

और मेरा हाथ अपने नौ पॉइंट चार इंच के लंड पर ऊपर-नीचे चलता रहता। मैं उनकी चूचियों को अपने हाथों में भरने की कल्पना करता — 38 इंच की भारी चूचियाँ, जो एक आदमी के हाथ में पूरी नहीं आतीं, जिन्हें पकड़ने के लिए दोनों हाथ चाहिए।

मैं कल्पना करता कि मेरा चेहरा उनकी चूचियों के बीच दबा है, और मेरा लंड उनकी बुर में है। बुर — जिसे मैंने कभी देखा नहीं था, लेकिन जिसकी तस्वीर मेरे दिमाग ने खुद बना ली थी।

गहरी, भरी हुई, गर्म, और जवान लड़की की बुर से बिल्कुल अलग — एक पकी हुई, अनुभवी, मीठी बुर।

लेकिन सबसे बड़ी दिक्कत ये थी कि दादी खुद बिल्कुल अनजान थीं। वो मुझे अब भी वही बच्चा समझती थीं, जो बीमार पड़ता था और उनकी गोद में सो जाता था।

मैं जब उनके पास से गुज़रता, तो उनकी चूची की गोलाई मेरी बाँह से टकरा जाती — और वो कुछ नहीं कहतीं, जैसे हो ही नहीं रहा हो।

जब मैं उनके पीछे खड़ा होकर बर्तन धोता, तो उनकी बयालीस की गांड चूल्हे के सामने झुकी होती, और मुझे पूरी पीठ दिखती — लेकिन वो बेखबर। यही तो सबसे बड़ी मुश्किल थी।

एक तरफ मेरे अंदर आग, दूसरी तरफ उनका पूरा ठंडापन। और बीच में सिर्फ — उम्र का फ़र्क़। सत्ताईस और पैंसठ। 38 साल का फ़ासला। मेरी उम्र से भी ज़्यादा।

लोग कहते थे “तू तो दादी की गोद में खेला है, अब दादी की गोद में क्या करेगा?” और मैं मन ही मन जवाब देता — “अब गोद से नीचे उतरूँगा।”

रसायन धीरे-धीरे बना। पहले नज़रों में, फिर छूने में, फिर ख़ामोशी में। एक बार मैं सुबह उठा तो देखा कि दादी ने मेरी चादर ठीक कर दी थी और मेरे पैरों पर हाथ फेर रही थीं — बिल्कुल बिना वजह।

एक बार वो चूल्हे पर रोटी बना रही थीं और पीछे से मैंने पानी माँगा, तो उन्होंने बिना मुड़े हुए पानी का गिलास पीछे बढ़ा दिया, और उनकी उँगलियाँ मेरी उँगलियों से रगड़ खा गईं — और वो तीन सेकंड तक हटाई नहींं। तीन सेकंड।

मेरे लिए वो तीन घंटे थे। फिर एक बार बारिश में मैं भीगकर आया, तो उन्होंने खुद तौलिया लेकर मेरा सिर रगड़ा, और उनकी चूचियाँ मेरी छाती से चिपकी रहीं — गीली, गर्म, भारी।

मैंने साँस रोक ली। उन्होंने पूछा “क्या हुआ, ठंड लग गई?”

और मैंने झूठ कहा “हाँ।” सच ये था कि उनकी चूची की नोक मेरी छाती पर पड़ी थी और मेरा लंड पैंट में तम्बू बना चुका था।

ऐसे ही छोटी-छोटी घटनाओं से एक पूरी कहानी बन गई — बिना किसी शब्द के। न उन्होंने कभी कुछ कहा, न मैंने। लेकिन हम दोनों जानते थे।

औरतें ये चीज़ें भाँप लेती हैं — और पैंसठ साल की औरत तो सबसे पहले भाँपती है। वो जानती थीं कि मेरी नज़र कहाँ रुकती है।

वो जानती थीं कि जब वो झुकती हैं तो मैं कहाँ देखता हूँ। वो जानती थीं कि जब वो ब्लाउज़ पहनती हैं, मेरी आँखें पहले उनकी चूचियों पर जाती हैं और फिर उनकी आँखों पर।

और वो ये भी जानती थीं कि मैं अब “बच्चा” नहीं हूँ। मेरे लंड का वज़न और मेरी नज़र का भार, दोनों ये बता रहे थे।

फिर वो रात आई। बारिश का मौसम था। बाहर बादल गरज रहे थे, और बिजली एक बार ऐसी कड़की कि पूरे मोहल्ले की लाइट गई। घर अँधेरे में डूब गया। मैं अपने कमरे में लेटा था, मोबाइल की टॉर्च जलाई हुई थी।

तभी दादी की आवाज़ आई — “प्रांशु, ज़रा इधर आ जा, मुझे अँधेरे में डर लग रहा है।” पैंसठ साल की औरत, जिसने पूरी ज़िंदगी अँधेरे में गुज़ारी हो, वो अचानक डर रही थी। मुझे पता था ये बहाना है। और मुझे ये भी पता था कि आज रात कुछ होगा।

मैं उठा, टॉर्च लेकर उनके कमरे में गया। वो चारपाई पर बैठी थीं, सफ़ेद साड़ी में, बाल खुले हुए, ब्लाउज़ के बटन ऊपर से दो खुले हुए।

और मैंने देखा — उनकी चूचियों का ऊपरी हिस्सा, दूध जैसा सफ़ेद, खुले बटनों की दरार से बाहर झाँक रहा था।

मैं चारपाई के किनारे बैठा। कुछ देर ख़ामोशी रही। बाहर बारिश की आवाज़। अंदर हमारी साँसों की आवाज़। फिर उन्होंने पहला शब्द कहा — और वो शब्द था, “प्रांशु, तू अब बड़ा हो गया है।”

बस। उसके बाद जो हुआ, वो दो लोगों के बीच नहीं, दो जिस्मों के बीच हुआ। न कोई शादी, न कोई वादा, न कोई नाम — बस एक रात, एक चारपाई, और एक बंद कमरे में बारिश। और वो रात आज भी मेरे अंदर बारिश की तरह गूँजती है।

“हाँ, बड़ा हो गया हूँ,” मैंने कहा। आवाज़ थोड़ी भारी थी।

वो मुस्कुराईं। अँधेरे में उनकी मुस्कान टॉर्च की रोशनी में आधी दिखी, आधी छिपी रही। फिर उन्होंने अपना हाथ बढ़ाया और मेरे गाल पर रख दिया।

उनका हाथ ठंडा था, नरम था, झुर्रियों वाला था — लेकिन उसमें एक ऐसी गर्मी थी जो पूरे बदन में फैल गई। उन्होंने मेरे गाल को सहलाया, फिर ठुड्डी, फिर गर्दन। जैसे कोई बरसों बाद अपनी चीज़ टटोल रहा हो।

“दादी…” मैंने कहा।

“अब दादी ही बुलाएगा?” उन्होंने पूछा। “इतनी देर में इतना बड़ा हो गया, और अब भी दादी ही?”

“तो क्या बुलाऊँ?”

उन्होंने जवाब नहीं दिया। सिर्फ मेरा हाथ उठाया और अपनी छाती पर रख दिया। ऊपर, ब्लाउज़ के ठीक ऊपर। और मैंने महसूस किया — उनकी चूची, 38 इंच की भारी चूची, मेरे हाथ के नीचे, ब्लाउज़ और ब्लाउज़ के अंदर की कॉटन ब्रा के नीचे, गर्म, भारी, और धड़कती हुई। उनका दिल तेज़ धड़क रहा था। इतना तेज़ कि मुझे अपनी हथेली पर महसूस हुआ।

“मेरा दिल देख,” उन्होंने धीरे से कहा, “इतना क्यों धड़क रहा है?”

“पता नहीं,” मैंने कहा।

“मुझे भी पता नहीं,” उन्होंने कहा और मेरी आँखों में देखा।

फिर मैंने अपना दूसरा हाथ बढ़ाया और उनकी कमर पर रख दिया। चौंतीस की कमर। मेरे हाथ की पकड़ में बिल्कुल फिट। जैसे ये कमर मेरे हाथ के लिए ही बनी हो। उन्होंने एक छोटी सी आह भरी। और मैंने उन्हें अपनी तरफ खींचा। वो मेरी गोद में आ गईं। पूरी की पूरी। पैंसठ साल की औरत, मेरी गोद में, मेरे सामने, मेरी छाती से चिपकी हुई। उनकी चूचियाँ मेरी छाती से दब गईं — इतनी भारी कि दबाव महसूस हुआ। उनकी बयालीस की गांड मेरी जाँघों पर बैठी, और मैंने महसूस किया कि उनके पेटीकोट के नीचे की गर्मी मेरे लंड तक पहुँच रही है।

और मेरा लंड — भगवान! मेरा लंड उस वक़्त इतना खड़ा था कि पैंट फटने वाली थी। नौ पॉइंट चार इंच, पूरा तना हुआ, और वो भी ऐसी जगह पर कि दादी की गांड के नीचे सीधा दब रहा था। जैसे ही वो मेरी गोद में बैठीं, उन्होंने एक बार फड़कता महसूस किया, और फिर वो हिलीं नहीं। जान-बूझकर नहीं हिलीं। जैसे उस दबाव को महसूस कर रही हों, नाप रही हों, पहचान रही हों।

“कुछ चुभ रहा है,” उन्होंने धीरे से कहा और हल्का सा मुस्कुराईं।

“हाँ,” मैंने कहा, “बहुत चुभ रहा है।”

“क्या है?”

“दिखा दूँ?”

उन्होंने गर्दन हिलाई। मैंने उनकी कमर पकड़ी, उन्हें उठाया, और चारपाई पर लिटा दिया। फिर अपनी पैंट की बेल्ट खोली, बटन खोला, और पैंट को थोड़ा नीचे सरकाया। अंदर से मेरा लंड बाहर निकला — लंबा, मोटा, नसों से भरा हुआ, और नोक पर चमकता हुआ। टॉर्च की रोशनी उस पर पड़ी।

दादी ने देखा। और सच कहूँ, तो उनकी आँखें एक पल के लिए फैल गईं। उन्होंने बिना कुछ कहे अपना हाथ बढ़ाया, और अपनी उँगलियाँ उस पर रख दीं। उनकी उँगलियाँ काँप रही थीं। उन्होंने ऊपर से नीचे तक उसे सहलाया — बिल्कुल वैसे, जैसे कोई अनजान चीज़ नाप रहा हो। फिर उन्होंने मुट्ठी बनाई और उसे पकड़ लिया। मेरी साँस रुक गई।

“इतना बड़ा?” उन्होंने धीरे से कहा। आवाज़ में हैरानी थी, और उस हैरानी के नीचे एक और चीज़ थी — भूख।

“हाँ,” मैंने कहा।

“अच्छा… तो तू बच्चा नहीं रहा,” उन्होंने कहा और मुस्कुराईं। फिर उन्होंने अपनी मुट्ठी ऊपर-नीचे करनी शुरू की। धीरे-धीरे। तीन बार। चार बार। और मेरे पूरे शरीर में झुरझुरी दौड़ गई।

मैंने उनका हाथ हटाया और आगे बढ़ा। अब मेरी बारी थी। मैंने पहले उनके पैरों के पास बैठकर उनकी साड़ी के पल्लू को खोला।

उन्होंने कमर पर बँधी गाँठ खुद खोल दी। साड़ी ढीली हुई, और फिर पेटीकोट। उन्होंने कमर उठाई, मैंने पेटीकोट को नीचे सरकाया।

और फिर — उनकी गांड, बयालीस इंच की, पूरी बाहर आ गई। गोल, चौड़ी, भारी, और सफ़ेद पेटीकोट की जगह अब सिर्फ उनकी त्वचा। मैंने दोनों हाथों से उनकी गांड पकड़ी और दबाया। दोनों हाथ भर गए। उन्होंने एक गहरी आह भरी — “हम्म्म।”

“दादी, आपकी गांड कितनी बड़ी है,” मैंने कहा।

“सारी उम्र चूल्हे पर खड़ी रही हूँ,” उन्होंने हँसकर कहा, “तू क्या समझेगा।”

फिर मैं ऊपर की तरफ बढ़ा। अब उनकी साड़ी का ऊपरी हिस्सा। ब्लाउज़ के बटन — जो पहले से ही दो खुले थे।

मैंने तीसरा खोला, चौथा, पाँचवाँ। और फिर उनकी चूचियाँ बाहर आ गईं। 38 इंच। भारी। गोल। नीचे को थोड़ी झुकी हुई — जैसा पैंसठ साल की औरत की चूचियों में होता है, और वही झुकाव उन्हें और भी औरत जैसा बनाता है।

उन पर बड़े, गहरे भूरे निपल्स थे, जो हवा लगते ही सख़्त हो गए। मैंने पहले दाएँ हाथ से एक चूची पकड़ी और दबाया। मेरी उँगलियाँ उस भारीपन में धँस गईं।

फिर मैंने दूसरी चूची पकड़ी। दोनों हाथ भर गए, और फिर भी पूरी नहीं आईं। मैंने उनके निपल्स को अँगूठे और तर्जनी के बीच लिया और हल्का सा दबाया, हल्का सा खींचा।

दादी ने आँखें बंद कर लीं। “आह…” उनके होंठों से आवाज़ निकली। “बहुत साल हो गए… इन्हें छुए हुए।”

“कितने साल?”

“तेरह। तेरे दादाजी के जाने के बाद।”

तेरह साल। तेरह साल से इन चूचियों को कोई हाथ नहीं मिला था। और आज मेरे दोनों हाथ उन्हें पकड़े हुए थे। यही सोचकर मेरा लंड और सख़्त हो गया।

मैंने झुककर अपना मुँह उनके निपल पर रख दिया। पहले चूमा, फिर जीभ से चारों तरफ घुमाया, फिर होंठों में भरकर चूसा।

दादी का पूरा शरीर एक बार झटके से उठा। उन्होंने मेरा सिर दोनों हाथों से पकड़ लिया और अपनी छाती पर दबा दिया। “हाँ… हाँ प्रांशु… ऐसे ही…” वो फुसफुसाईं।

मैंने दूसरे निपल को भी वही इज़ाज़त दी। चूसा, काटा, जीभ से खेला। और उनकी चूचियों के बीच वो गड्ढा था — जहाँ मैंने अपना चेहरा दबा दिया और गहरी साँस भरी।

उनके बदन की गंध — नहाने के साबुन की, हल्की हल्दी की, और उसके नीचे उनकी अपनी, एक पकी हुई औरत की गंध। मैं उस गंध में डूब गया।

फिर मैंने उनके दूध को दबाया। हाथ लगाकर ऊपर से नीचे तक दबाते हुए, जैसे कोई आटा गूँथता हो — और वो सचमुच उतने ही नरम और भारी थे।

दादी ने एक लंबी आह भरी और अपनी पीठ कमान बना ली। “प्रांशु… तेरे हाथ कहाँ-कहाँ घूम रहे हैं…”

“जहाँ आप चाहें,” मैंने कहा।

“तो नीचे भी आ,” उन्होंने कहा।

नीचे। मैं उनकी जाँघों के पास गया। उन्होंने खुद अपनी टाँगें खोल दीं — बिना शरम, बिना झिझक, जैसे इंतज़ार कर रही हों। और मैंने पहली बार उनकी बुर देखी।

भगवान। एक पैंसठ साल की औरत की बुर — और ऐसी! भरी हुई, मोटे-मोटे होंठों वाली, ऊपर घने बालों का एक हल्का सा जंगल, और बीच से गीली, चमकती हुई।

तेरह साल की तपस्या के बाद पहली बार खुली हुई। मैंने अपनी उँगली बढ़ाई और उसके होंठों पर फेरी। दादी ने हिप उठाई और एक तेज़ “आह” निकाली।

मेरी उँगली फिसलकर अंदर गई — गर्म, नरम, तंग, और पूरी तरह गीली। मैंने धीरे-धीरे अंदर-बाहर करना शुरू किया।

एक उँगली, फिर दो। दादी की आँखें बंद, होंठ खुले, साँस तेज़। उनके हाथ मेरे बालों में। उनकी एड़ियाँ चारपाई पर सरक रही थीं।

फिर मैंने अपना मुँह उनकी बुर पर रख दिया। जीभ से पहले ऊपर की गोली पर, फिर होंठों पर, फिर अंदर तक।

दादी का पूरा जिस्म एक बार हिला — “हाय राम!” उन्होंने चीख मारी, और फिर अपना हाथ अपने मुँह पर रख लिया, क्योंकि पड़ोस में कोई जाग सकता था। लेकिन फिर उन्होंने हाथ हटा दिया और पूरी आवाज़ में कराहने लगीं।

मैं उनकी बुर को ऐसे चूस रहा था जैसे प्यासा हूँ, और उनकी बुर का रस मेरे मुँह में भर रहा था — मीठा, नमकीन, गर्म।

मैंने जीभ को अंदर तक डाला, ऊपर-नीचे किया, गोल घुमाया। दादी की जाँघें मेरे कानों को दबाने लगीं, उनकी गांड चारपाई पर उठने लगी।

और तभी उन्होंने मेरा सिर दोनों हाथों से पकड़कर अपनी बुर पर दबा दिया और एक लंबी, टूटती हुई आह निकाली — और अपनी पहली झड़प में आ गईं।

वो काँपती रहीं। पूरा जिस्म काँपता रहा। मैंने अपना मुँह नहीं हटाया, उनके रस को पीता रहा। जब वो शांत हुईं, तब मैंने सिर उठाया और उनकी आँखों में देखा। उनकी आँखों में पानी था।

“तेरह साल बाद,” उन्होंने फुसफुसाया, “तेरह साल बाद पता चला कि मेरे अंदर अभी भी कुछ ज़िंदा है।”

मैंने उनका माथा चूमा। “अभी तो शुरुआत है, दादी।”

“तो शुरू कर,” उन्होंने कहा, “और अब दादी मत बुला। नीलम बुला।”

नीलम ने मुझे अपने ऊपर आने दिया। पहला दौर हमने बिल्कुल पुराने तरीके से किया — जैसे गाँव की औरतें करती हैं, जैसे दादी की उम्र की औरतें करती हैं।

कोई शोर नहीं, कोई नाटक नहीं, कोई पोज़ नहीं। बस मिशनरी। औरत नीचे, आदमी ऊपर, दोनों एक-दूसरे को जकड़े हुए, आँखों में आँखें डाले।

मैं उनके ऊपर आया। उन्होंने अपनी टाँगें मेरी कमर पर लपेट लीं। मैंने अपने लंड की नोक उनकी बुर के होंठों पर रखी और धीरे से आगे बढ़ाया। सिर्फ नोक अंदर गई — और उन्होंने आँखें बंद कर लीं।

फिर थोड़ा और। फिर थोड़ा और। उनकी बुर मोटी और तंग थी, और मेरा लंड उसके लिए बड़ा था — नौ पॉइंट चार इंच। जैसे-जैसे अंदर जा रहा था, उनकी साँस फूलती जा रही थी। जब पूरा अंदर गया, तो उन्होंने मेरी पीठ दोनों हाथों से पकड़ ली और एक लंबी “आह्ह्ह्ह्ह” निकाली।

“पूरा अंदर है?” उन्होंने फुसफुसाया।

“पूरा,” मैंने कहा।

“तेरह साल में… इतना बड़ा कभी अंदर नहीं आया,” उन्होंने कहा और मेरी गर्दन में मुँह छिपा लिया।

फिर मैंने हिलना शुरू किया। धीरे-धीरे। पुराने तरीके से। हर धक्का लंबा, हर धक्का गहरा, हर धक्के के बाद एक ठहराव। जैसे कोई गीत गा रहा हो, ताल पर।

उनकी बुर मेरे लंड को पूरी तरह जकड़े हुए थी — अंदर आते ही सिकुड़ जाती, बाहर जाते ही खींचती। पैंसठ साल की औरत की बुर, जिसने तेरह साल का वनवास काटा था — और आज पहली बार उसे अपना हक़ मिल रहा था।

दादी की आँखों में पानी बह रहा था। और वो मेरी आँखों में देखे जा रही थी। बिना पलक झपकाए।

जैसे डर हो कि कहीं मैं ग़ायब न हो जाऊँ। उन्होंने मेरे गाल पर हाथ रखा और धीरे से कहा, “प्रांशु, तू जानता है तू क्या कर रहा है?”

“हाँ,” मैंने कहा।

“किसे चोद रहा है?”

“अपनी दादी को,” मैंने कहा, और उन्होंने एक कराह निकाली।

“और तेरी दादी कैसी लग रही है?”

“सबसे सुंदर,” मैंने कहा। “सबसे गर्म। सबसे औरत।”

उन्होंने मुझे अपनी छाती से चिपका लिया। उनकी चूचियाँ मेरी छाती पर दब गईं। उनके निपल्स मेरे निपल्स से रगड़ खा रहे थे।

उनकी गांड मेरे नीचे थी, और मेरा हाथ नीचे जाकर उसे भर-भर के पकड़ रहा था। हर धक्के पर उनकी गांड की मांसपेशियाँ मेरे हाथों में हिलतीं।

और उनकी बुर — वो मेरे लंड को चूस रही थी, बार-बार, धीरे-धीरे, जैसे कोई बच्चा मिठाई चूसता है।

हम इसी तरह मिनटों तक चलते रहे। कोई जल्दी नहीं थी। दोनों जानते थे कि रात लंबी है। बाहर बारिश बरस रही थी।

अंदर हमारी चारपाई चरमरा रही थी — धीरे-धीरे, एक ताल में। दादी की आहें अब शब्दों में बदल रही थीं। “हाँ… हाँ… ऐसे… और… और अंदर…”

फिर उनका दूसरा झड़प आया। उन्होंने दोनों टाँगें कस लीं, पीठ कमान बनाई, और मेरे लंड को इतनी ज़ोर से जकड़ लिया कि मुझे रुकना पड़ा। वो काँपीं, फिर ढीली पड़ गईं।

मैंने उनका माथा चूमा और उनके गालों को चूमा और उनकी गर्दन को चूमा। उन्होंने आँखें खोलीं और मुस्कुराईं।

“अब भी अंदर है?” उन्होंने पूछा।

“हाँ,” मैंने कहा, “और अभी बहुत देर है।”

और फिर वो हुआ, जिसकी मुझे उम्मीद नहीं थी।

दादी उठकर बैठीं। अपने बाल ऊपर करके एक ढीली गाँठ बनाई। फिर मेरे लंड को देखा — जो अभी भी खड़ा था, भीगा हुआ, चमकता हुआ।

उन्होंने उसे अपने हाथ में लिया, और फिर जो किया, वो सीधे पोर्न मूवी से लिया हुआ था।

उन्होंने झुककर अपना मुँह मेरे लंड पर रख दिया।

पैंसठ साल की दादी, जो सारी उम्र मिशनरी करती रही, जिसे पता भी नहीं था कि ब्लोजॉब क्या होता है — वो आज मेरा लंड अपने मुँह में ले रही थीं। पहले नोक चूमी।

फिर जीभ से नीचे के हिस्से पर फेरी। फिर ऊपर से नीचे, पूरे लंड पर जीभ चलाई। और फिर मुँह में लेकर चूसने लगीं।

“नीलम!” मैंने कहा, “ये आपने कहाँ से सीखा?”

उन्होंने लंड मुँह से निकाला, मुस्कुराईं और कहा, “तेरे मोबाइल में। तेरे फोन में जो पोर्न मूवीज हैं न, वो रात में तेरे साथ सो जाने के बाद मैं देख लेती हूँ। सोचा, कभी तो काम आएगा।”

मैं सन्न रह गया। ये औरत! ये औरत मेरे पोर्न देखती थी! और मैंने उन्हें इतना भोला समझ रखा था!

“तो फिर,” मैंने कहा, “आज वही करेंगे जो उन मूवीज में होता है।”

“चल,” उन्होंने कहा, “लेकिन ज़ोर से। और अब मुझे भी हया नहीं है।”

बस। फिर जो शुरू हुआ, वो सीधे 2026 का पोर्न सीज़न था।

उन्होंने अपने घुटने और हाथ चारपाई पर टिकाए और अपनी गांड ऊपर उठा ली — डॉगी स्टाइल।

बयालीस इंच की गांड, मेरे सामने, पूरी खुली हुई, और उसके नीचे उनकी बुर, जो अभी भी गीली और लाल थी। उन्होंने पीछे से देखा और कहा, “अब ऐसे चोदो जैसे फिल्म में होता है।”

मैं पीछे आया। दोनों हाथों से उनकी गांड पकड़ी और दोनों चूतड़ों को अलग करके अपना लंड सीधा अंदर डाल दिया। इस बार कोई धीरे-धीरे नहीं — इस बार एक ही झटके में पूरा अंदर। दादी ने तेज़ चीख मारी — “आह्ह्ह बस!” और फिर उन्होंने मुझे चलने दिया।

और मैं चला। ज़ोर से। हर धक्का उनकी गांड को आगे धकेलता, और हर धक्के पर उनकी गांड की मांसपेशियाँ मेरे पेट से टकराती — एक चटाक की आवाज़ के साथ। चटाक… चटाक… चटाक… बारिश की आवाज़ के नीचे, चारपाई की चरमराहट के नीचे, ये चटाक सबसे ऊपर था।

“हाँ प्रांशु! हाँ! ऐसे ही! ज़ोर से! और ज़ोर से!” दादी अब चीख रही थीं। कोई शरम नहीं, कोई हया नहीं। सिर्फ भूख। तेरह साल की भूख। एक औरत की पूरी भूख।

मैंने एक हाथ उनकी गांड से हटाकर उनके नीचे ले जाकर उनकी बुर की गोली पर रखा और धक्कों के साथ-साथ उसे रगड़ने लगा।

दादी का पूरा जिस्म एक बार हिला और वो चारपाई पर मुँह टिकाकर कराहने लगीं। मेरा दूसरा हाथ उनकी पीठ से होते हुए नीचे झूलती हुई चूचियों तक पहुँचा।

उनकी चूचियाँ डॉगी में नीचे लटक रही थीं — भारी, 38 इंच, एक-एक करके हिल रही थीं। मैंने उन्हें पकड़ा और दबाया और उनके निपल्स को उँगलियों में भर लिया।

और जब मैंने निपल्स को खींचा, तो दादी ने एक ऐसी आवाज़ निकाली जो शायद उन्होंने पूरी ज़िंदगी में नहीं निकाली थी।

“निपल्स मत छोड़ो,” वो फुसफुसाईं, “पकड़े रखो। दबाओ।”

“और बुर?”

“बुर तो तू चोद ही रहा है,” उन्होंने कहा और हँसी — एक बेईमान, गंदी, प्यारी हँसी। “उसे भी मत छोड़।”

फिर उन्होंने मुझे रोका, बाहर निकलीं, और पलटकर चारपाई पर लेट गईं।

लेकिन मिशनरी में नहीं — उन्होंने अपनी टाँगें ऊपर उठाकर पूरी खोल दीं, और दोनों हाथों से अपनी चूचियों को ऊपर उठाकर पकड़ लिया, जैसे कोई फिल्म में अपना दूध दिखाती है।

“अब ऐसे,” उन्होंने कहा, “जैसे फिल्म में लड़की ऊपर आती है।”

वो ऊपर आ गईं। काउगर्ल। पैंसठ साल की औरत, मेरे ऊपर, मेरी कमर पर बैठी हुई, दोनों हाथ मेरी छाती पर। उनकी चूचियाँ सामने लटकी हुईं, हर उठक-बैठक पर हिलती हुईं।

उनकी गांड मेरी जाँघों पर टकराती हुई। और मेरा लंड उनके अंदर, और वो ऊपर-नीचे, ऊपर-नीचे। उन्होंने अपनी रफ़्तार खुद पकड़ी।

पहले धीमी, फिर तेज़, फिर और तेज़। पसीना उनके माथे से बह रहा था, उनके गले से नीचे, चूचियों के बीच, पेट पर, और मेरे ऊपर गिर रहा था।

उनके बाल खुल गए थे। आँखें आधी बंद थीं। होंठ खुले थे। और वो कराह रही थीं — लगातार, टूटती हुई, बिना रुके।

“ये मज़ा है,” उन्होंने कहा, “ये असली मज़ा है। पैंसठ साल में पहली बार ऐसा मज़ा।”

“आपकी बुर कस रही है,” मैंने कहा।

“कसेगी,” उन्होंने कहा और मेरी तरफ झुककर अपनी चूचियाँ मेरे मुँह पर रख दीं। “अब चूस। और मत पूछ क्या करना है।”

मैंने चूसा। दूध जैसी नरम चूचियाँ, जिनमें अब भी वो पूरा भार था — 38 इंच, पूरे, गर्म, और निपल्स मेरे होंठों में सख़्त।

मैंने निपल्स को चूसा, काटा, जीभ से खेला। और वो ऊपर-नीचे करती रहीं — तेज़, ज़ोर से, मेरे पेट पर टकराती हुई, मेरे अंदर तक लेती हुई।

मेरे हाथ उनकी गांड पर गए और उसे भर-भर के पकड़ा, और हर उठक पर उनकी गांड को नीचे दबाया — जिससे मेरा लंड और गहरा अंदर जाता।

दादी अब पूरी तरह उस औरत में बदल चुकी थीं जिसे मैंने इतने साल सिर्फ कल्पना में देखा था। बोलती थीं, गाली देती थीं, माँग करती थीं।

“प्रांशु, तेरा लंड बहुत बड़ा है। बहुत मोटा है। मेरी बुर फाड़ दी।”

“अच्छा लगा?”

“बहुत अच्छा लगा। पूरी ज़िंदगी याद रहेगा।”

“तो फिर आगे भी करेंगे?”

“रोज़,” उन्होंने कहा। “जब तक ये बूढ़ा जिस्म चलेगा, रोज़।”

फिर उन्होंने अपनी रफ़्तार बढ़ाई। और मैं भी नीचे से उठकर उनसे मिलने लगा। दोनों एक-दूसरे पर चढ़ते, गिरते, फिर उठते। पूरी चारपाई चरमरा रही थी।

बाहर बारिश बरस रही थी। और अंदर, एक सत्ताईस साल का लड़का अपनी पैंसठ साल की दादी को चोद रहा था — जैसे पोर्न मूवी में होता है, लेकिन जैसे दिल से होता है।

मेरी चरम सीमा पास आ गई। दादी ने इसे महसूस किया। उन्होंने और तेज़ कर दिया। “अंदर ही छोड़ना,” उन्होंने कहा, “आज कोई हिसाब नहीं।”

“और आप?”

“मैं तो तीन बार आ चुकी,” उन्होंने मुस्कुराकर कहा, “अब तेरी बारी। छोड़ दे। पूरा अंदर।”

और मैंने छोड़ दिया। एक लंबे, गहरे, काँपते हुए धक्के के साथ। पूरा अंदर। दादी ने अपनी गांड नीचे दबाई, मेरे लंड को अपने अंदर जकड़ा, और मुझे अपनी चूचियों से दबा लिया।

मेरे पूरे शरीर में एक झुरझुरी दौड़ी — सिर से पाँव तक। और उनका जिस्म भी काँपा, फिर एक बार, फिर एक बार।

हम दोनों ऐसे ही रहे। मेरा लंड अंदर। उनकी बुर ने उसे पकड़े रखा। और हम दोनों ने एक-दूसरे की गर्दन में मुँह छिपा लिया।

कुछ देर बाद उन्होंने धीरे से कहा, “अब उतर जा, बूढ़ी औरत की टाँगें दुख रही हैं।”

मैं हँसा। “अभी-अभी कह रही थीं कि रोज़ करेंगे।”

“रोज़ करेंगे,” उन्होंने कहा, “लेकिन आज सो जा। और हाँ — आज अपने कमरे में मत जाना। आज यहीं सो।”

मैं उनके बगल में लेट गया। उन्होंने अपनी टाँग मेरी टाँग पर डाली, अपना सिर मेरी छाती पर रखा, और मेरा हाथ अपनी गांड पर रख लिया। बाहर बारिश बंद हो चुकी थी। अंदर बस हमारी साँसें बची थीं।

और उस रात के बाद हमारी दुनिया बदल गई। दिन में वो मेरी दादी थीं। रात में वो मेरी नीलम थीं।

सुबह की चाय में जो हाथ मेरा हाथ छूता था, वही हाथ रात को मेरे लंड को पकड़ता था।

जो आवाज़ “प्रांशु, खाना खा ले” कहती थी, वही आवाज़ रात को “और ज़ोर से, और अंदर” कहती थी।

और मैं हर रात उसी बिस्तर पर सोता था। और हर रात हम एक नया तरीका खोजते थे। कभी खड़े-खड़े, दीवार के सहारे।

कभी कुर्सी पर बैठकर, वो मेरी गोद में। कभी स्नानघर में, नल के नीचे, गीले जिस्म, फिसलते हुए, हँसते हुए। कभी रसोई में, आटा गूँथते-गूँथते, उनकी साड़ी ऊपर, पेटीकोट नीचे, और एक ही झटका — जल्दी, गुपचुप, जैसे पड़ोस में कोई आ जाए।

कहानी यहीं खत्म नहीं होती। असल में यहीं से असली शुरुआत होती है।

मेरे दो घनिष्ठ दोस्त थे — रोहित और आकाश। दोनों सत्ताईस-अट्ठाईस के, दोनों मेरे ही गाँव के, दोनों रात भर बैठकर पोर्न देखने वाले।

एक शाम दोनों हमारे घर आए, चाय पी, बैठे। दादी चाय बनाकर लाईं — आज भी वही साड़ी, वही ब्लाउज़, वही चाल।

लेकिन अब मुझे पता था कि उस साड़ी के नीचे क्या है, और उस चाल के पीछे क्या राज़ है। दोनों की नज़र भी अब पहले जैसी नहीं थी।

रोहित ने धीरे से मुझसे पूछा, “भाई, दादी माँ अभी भी बहुत फिट हैं न?”

मैं मुस्कुराया। “हाँ, बहुत।”

रात को जब दोनों गए, तो दादी मेरे पास आईं और सीधा पूछा, “तेरे दोनों दोस्त… देख रहे थे मुझे?”

“हाँ,” मैंने कहा।

“अच्छा,” उन्होंने कहा और फिर जो कहा, वो मुझे नहीं भूलता। “प्रांशु, तेरे फोन में मैंने ग्रुप चुदाई भी देखी है। एक औरत, दो-तीन आदमी। सब मिलकर।”

“तो?”

“तो एक बार,” उन्होंने धीरे से कहा, “उन दोनों को भी बुला।”

मैंने पूछा, “आपको शरम नहीं आएगी? दो और लड़के, आपसे आधी उम्र के?”

उन्होंने मेरी तरफ देखा और कहा — “प्रांशु, जिस औरत को तेरह साल बाद पहली बार चोदा गया हो, उसे अब शरम किस चीज़ की? अब तो बस चाहिए। और जब चाहिए, तो पूरी चाहिए।”

फिर उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा और अपनी गांड पर रख दिया — बयालीस इंच, वो पूरी गांड। “देख,” उन्होंने कहा, “इस गांड को तीन लंड चाहिए। एक से तो ये भरती ही नहीं। और मेरी चूचियाँ — 38 इंच — एक लड़के के लिए बहुत हैं। दो हाथ चाहिए। तू अकेला है, तेरे दो हाथ हैं। दो दोस्त आएंगे, तो छह हाथ होंगे। और मेरी बुर — वो तो अब रोज़ खुल रही है। एक लंड से अब वो भी अधूरी लगती है।”

मैं हँस पड़ा। “तो पूरा प्लान बना रखा है आपने।”

“सोच-सोचकर,” उन्होंने कहा, “रात भर। तू सो जाता है, मैं जागती रहती हूँ, और सोचती हूँ — कि तीन लड़के, एक बूढ़ी औरत, एक चारपाई। कितना मज़ा आएगा।”

तो अगली बार का हाईलाइट यही है, और वो अब सिर्फ सोचा हुआ नहीं — तय हो चुका है। अगले शनिवार। रोहित और आकाश आएंगे। रात का खाना खाएंगे। फिर बिजली गुल होगी — दादी खुद मेंटेन करेंगी।

और फिर उस एक चारपाई पर, उसी कमरे में, जहाँ पहली बार मैंने उनकी बुर देखी थी, हम तीनों एक ही औरत को चोदेंगे।

दादी का प्लान ये है — पहले रोहित उनकी बुर में, मैं उनके मुँह में, और आकाश उनकी चूचियों से खेलेगा। फिर अदला-बदली। फिर डॉगी में एक पीछे, एक आगे, और एक चूचियों पर। फिर वो तीनों की गोद में बारी-बारी बैठेंगी और हर एक को पूरा चूसेंगी।

और आख़िर में — जब तीनों की बारी आएगी — वो अपनी गांड ऊपर उठाकर कहेंगी, “अब सब एक-एक करके, और अंदर ही छोड़ना, कोई बाहर नहीं।”

मैंने उनसे पूछा, “तीन लंड, नीलम? आप संभाल पाओगी?”

उन्होंने मेरी तरफ देखा, अपनी चूचियाँ ऊपर कीं, और कहा — “प्रांशु, पैंसठ साल की औरत को तू कम मत समझ। मैंने तेरह साल बर्बाद किए हैं। अब मैं बर्बाद नहीं करूँगी।”

और मैंने उनकी गांड दबाई, उनकी चूचियाँ दबाईं, उनकी बुर को अपनी उँगलियों में लिया, और कहा — “तो शनिवार को, दादी माँ।”

उन्होंने मेरे कान में मुँह रखकर धीरे से कहा — “दादी माँ नहीं, बेटा। शनिवार को बस नीलम। और नीलम को तीन लड़के चोदेंगे।”

अगली बार मिलते हैं — उस शनिवार की रात, जब मैंने, रोहित ने और आकाश ने मिलकर अपनी दादी को पोर्न मूवीज की तरह चोदा।

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नोट:

यहां पोस्ट की गई सभी कहानियां केवल मनोरंजन के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई हैं। कृपया इन्हें वास्तविक जीवन से जोड़कर न देखें। कहानी में दर्शाए गए किसी भी दृश्य, घटना या चित्र का वास्तविक जीवन में प्रयोग करना हानिकारक हो सकता है। इसके लिए न तो कहानी के लेखक और न ही प्रस्तुतकर्ता जिम्मेदार होंगे। इसलिए कृपया अपनी समझ, बुद्धि और विवेक का उपयोग करें।

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