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माँ-बेटा

माँ संग सविता आंटी की थ्रीसम चुदाई!

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Antarvasna Family Sex Stories : माँ ने खुली रखी कुंडी, फिर सविता आंटी ने शुरू किया थ्रीसम! बेटे ने आंटी और माँ दोनों की कोख में बिना कंडोम उतारा माल! Group Sex.

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"माँ की चुदाई की चाहत! 02"

में पढ़ा :-

“कितनी प्यासी थी माँ? उंगली से काम नहीं चल रहा था ना? जवान लंड चाहिए था।”

“चाहिए था… अह्ह्ह कबूल है… सविता सही कहती थी… जवान लड़के पर मरती हूँ… अपने लड़के पर… अह्ह्ह शर्म से मर जाऊँ… लेकिन अभी मत निकाल… अंदर रख… पूरा रख…”

मैंने उनके मुँह पर हाथ रखा, फिर हटाया। “चीखो। घर में हम ही हैं। पापा की फ्लाइट हफ्ते भर बाद है। आज चीखो।”

माँ ने दबी चीख खोली। “आह्हhhhh… आरव… माँ झड़ने वाली है… बेटे के लंड पर झड़ रही हूँ… अह्ह्ह आ गया… आ गया…”

शरीर अकड़ा। चूत फड़क-फड़क कर निचोड़ने लगी। उनके पानी ने मेरा लंड और फिसलन भरा कर दिया। मैं रुकने वाला था बाहर निकालने को। माँ ने कमर पकड़कर अंदर खींच लिया।

“अंदर… कंडोम नहीं… गैर मर्द होता तो डालती… तू मेरे खून का है… अह्ह्ह छोड़ अंदर… माँ की चूत में माल भर… कोख में उतार…”

कमर अकड़ी। पहला झटका गहरा गया। गरम माल उनकी चूत में छूटा। माँ हर झटके पर काँपीं, नाखून पीठ पर लकीरें काटते रहे।

“उफ्फ्फ… कितना गरम… भर गया… अह्ह्ह आरव… और निकले तो और दे… निकाल मत अभी… अंदर धड़कने दे…”

मैं उनके ऊपर गिरा। लंड अभी भी अंदर था, ढीला पड़ता, उनकी दीवारें चूस रही थीं। माँ की साँस मेरे कान पर टूटी। बहुत देर तक कोई नहीं बोला। सिर्फ पसीना और चूत से रस मिलकर बहने की हल्की आवाज।

फिर उन्होंने छत की तरफ देखा। आवाज फिर माँ वाली हो चली, लेकिन शरीर अभी भी लिपटा था।

“यह आखिरी बार था। सुन रहा है? आखिरी। सुबह मैं पराठा बनाऊँगी। तू बेटा बनकर खाना। यह रात किसी को नहीं बतानी। सविता को भी नहीं। उस औरत को लगा कि दरवाजा खुल गया तो वो घुस आएगी।”

मैंने लंड बाहर निकाला। उनकी चूत से सफेद माल रिसने लगा, जांघों पर लकीरें बनाता। माँ ने टांगें जोड़ीं, जैसे छुपा सकें। छुप न सका।

“आखिरी बार कह रही हो, दरवाजा कल भी खुला रहेगा।”

वो मेरी तरफ देखीं। आँखों में पानी था, इंकार अधूरा था। “ताला लगाऊँगी।”

अब आगे :-

सुबह वाली सख्ती पूरे दिन चली। माँ ने आँख नहीं मिलाई। दोपहर में पापा का मैसेज आया — फ्लाइट समय पर, पाँच दिन बाद लैंडिंग। माँ ने फोन मुझे दिखाया जैसे चेतावनी हो।

बोलीं, “देख लिया? पाँच दिन। उसके बाद यह घर पहले जैसा रहना चाहिए।”

मैंने सिर हिलाया। जवाब नहीं दिया। रात ग्यारह बजे उनके दरवाजे के सामने से गुजरा। कुंडी खुली थी, एक बित्ता। अंदर अंधेरा। मैंने खटखटाया नहीं। अपने कमरे चला आया।

आज अगर आना है तो उन्हें आना चाहिए। आखिरी बार उन्होंने कहा था। झूठ उन्होंने ही पकड़ना था।

बारह बजकर पंद्रह मिनट पर मेरे दरवाजे पर हल्की सी दस्तक हुई। फिर बिना इंतजार किए किवाड़ खुला। माँ नाइटी में खड़ी थीं। बाल खुले। पैर नंगे। हाथ में कुछ नहीं था - न पानी का गिलास, न बहाना।

“सो गया?”

“नहीं।”

वो अंदर आईं। दरवाजा बंद किया। कुंडी लगाई। पीठ दरवाजे से लगी रही, जैसे अभी भी भाग सकें। “मैं आखिरी बार कहकर आई हूँ। तू समझ रहा है ना? आखिरी। पापा के आने से पहले यह चुत की आग बुझनी चाहिए।”

“बुझाने आई हो या जलाने?”

चेहरा तन गया। फिर ढीला पड़ा। “मुझे पता नहीं। दिन भर पराठा बेला, बर्तन माँजे, तेरी सख्त माँ बनी। रात होते ही चूत ने याद दिलाया कि कल अंदर क्या भरा था। सो नहीं पाई। इसलिए आई हूँ। माँ बनकर नहीं… हारकर।”

मैं बिस्तर पर बैठा रहा। पास नहीं गया। “तो आज क्या करना है माँ?”

वो मेरे पास आईं। नाइटी की पतली कपड़े से स्तन साफ उभर रहे थे, निप्पल कपड़े में गड़ रहे थे। उन्होंने मेरा हाथ लिया और अपनी जांघ पर रखा, नाइटी के अंदर। पैंटी नहीं थी।

“जो कल किया था… वही कर। लेकिन बात कम। मैं सुन नहीं सकती बार-बार कि तू मेरा बेटा है। मैं जानती हूँ। इसीलिए रो रही हूँ अंदर से।”

हाथ चूत तक गया। पहले से गीली। कल वाले माल की हल्की सुजन अभी भी थी। उंगली रखते ही माँ की कमर झुकी, माथा मेरे माथे से लगा।

“आह्ह्ह… हल्के हाथ लगाना… कल फट गई थी… अह्ह्ह आरव… तूने माँ की चूत सुजा दी थी…”

मैंने उन्हें बिस्तर पर खींच लिया। नाइटी ऊपर की। स्तन बाहर आए। इस बार उन्होंने ब्रा पहनी ही नहीं थी। मैंने मुँह लगाया तो उनकी उंगलियाँ बालों में फंस गईं — दबाने वाली।

“चूस… आज खुद चूसवा रही हूँ… अह्ह्ह… गंदी माँ… अपने बेटे से चूचा चूसवा रही हूँ… काट हल्का… हाँ वहीं…”

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मैं नीचे गया। जांघें खुद खुलीं। जीभ लगते ही वो तकिया नहीं ढूँढ़ने लगीं। कराह दबाने की जगह दाँत होंठ पर रखे।

“आह्ह्ह… चाट… कल तूने जो चाटा था ना… दिन भर वो महसूस हुआ… अह्ह्ह क्लिट… वहीं रख… माँ की चूत चाट… रंडी माँ की…”

शब्द उनके मुँह से काँपकर निकले, जैसे खुद सुनकर डर रही हों। मैंने उंगली अंदर की। ढीली नहीं थी, सिर्फ पहचानी हुई। माँ ने मेरा बाल खींचकर ऊपर उठाया।

“बस… अब डाल। आज तड़पा मत। मैं भाग जाऊँगी सोचने लग गई तो।”

पजामा नीचे किया। लंड उनकी जांघ पर रखा। माँ ने खुद हाथ से पकड़ा, चूत के मुँह पर सेट किया। नोक गीली फाँक में धँसी। उन्होंने आँखें बंद कीं।

“धीरे… फिर भी धीरे… अह्ह्ह हाँ… अंदर ले जा… पूरा…”

एक धक्के में जड़ तक बैठ गया। माँ की टांगें लिपट गईं। इस बार चीख दर्द वाली कम, भूख वाली ज्यादा थी।

“आह्हhhhh… भर गया… माँ की चूत फिर भर गई… आरव चल… अब चल… अह्ह्ह चोद… आखिरी बार कहकर चोद रही हूँ… तो आज पूरा चोद…”

मैंने धक्के दिए। बिस्तर बोला। उनके स्तन उछले। मैंने एक हाथ गांड पर मारा। थप्पड़ की आवाज कड़की। माँ की चूत कस गई।

“मार… अह्ह्ह… सख्त माँ को मार… जो खाल उधेड़ने कहती थी उसे चोद… अह्ह्ह और तेज़… पापा पाँच दिन बाद आएँगे… तब तक की प्यास आज निकाल…”

“आखिरी बार है तो अंदर ही छोड़ूँ?” ये Family Antarvasna Kamuk Kamvasna Ki Chudai Ki Kahani आप गरमकहानी डॉट कॉम पर पढ़ रहे है!

“अंदर… गैर को कंडोम… तुझे मेरे पेट का माल… अह्ह्ह छोड़… कोख में छोड़… माँ की चूत तेरी हो गई आज रात…”

स्पीड बढ़ी। चप-चप तेज हो गई। माँ अब खुद कमर उठा-उठाकर जवाब दे रही थीं। बाल बिखरे, मुँह खुला, आँखें भींचीं।

“आह्ह्ह… बेटे का लंड… माँ चोद रही है… गंदी… मैं गंदी औरत… अह्ह्ह आरव नाम ले… चोदते वक्त माँ बोल… सुनना है मुझे…”

“माँ… तेरी चूत कितनी गरम है… सुबह पराठा बनाने वाली चूत रात को लंड निगल रही है…”

“निगल रही है… अह्ह्ह और निगलेगी… आ गया… झड़ रही हूँ… मत निकालना…”

शरीर अकड़ा। चूत ने लंड जकड़ लिया। मैं उनके अंदर ही झड़ गया — गरम माल फिर उनकी गहराई में उतरा। माँ हर झटके पर काँपीं, मेरे कंधे में मुँह दबाए।

“उफ्फ्फ… भर दिया… फिर से भर दिया… अह्ह्ह मत निकल अभी…”

बहुत देर तक अंदर रहा। माँ के नाखून ढीले पड़े। साँसें थमीं। फिर उन्होंने मेरे सिर को स्तन से हटाया। आँखें गीली थीं, आवाज फिर सख्त होने की कोशिश कर रही थी।

“अब निकल जाऊँगी। तू सो। सुबह मैं वही माँ हूँ। यह नाइटी, यह कुंडी, यह रात - कुछ हुआ ही नहीं।”

मैंने लंड बाहर निकाला। माल उनकी जांघ पर बह निकला। उन्होंने नाइटी नीचे की, जैसे कपड़ा पाप ढक देगा। दरवाजे तक गईं। हाथ कुंडी पर रखा, मुड़ीं।

“सविता को कुछ मत कहियो। उस औरत को लगा कि हवा आई है तो वो तूफान बनकर आएगी। यह घर दो लोगों का पाप सह सकता है, तीन का नहीं।”

“पापा का फोन आया तो?”

“तो तू बेटा बन जाना। लंड भूल जाना। मैं भी भूलने की कोशिश करूँगी।” वो रुकीं। “कोशिश… वादा नहीं कर सकती।”

गेट नहीं - मेरे कमरे का दरवाजा बंद हुआ। कदम उनके कमरे तक गए। कुंडी की आवाज नहीं आई। खुला छोड़ गईं।

मैं बिस्तर पर लेटा रहा। चादर पर उनकी गंध थी। पाँच दिन बाकी थे। माँ ने आखिरी बार कहा था — दूसरी बार। सविता आंटी का फोन कल फिर आने वाला था।

और पापा की फ्लाइट आसमान में कहीं लिखी थी, रद्द होने के डर के साथ।

घर बाहर से वैसा ही था। अंदर रेखा कट चुकी थी। अब बचता था समय… और वो औरत जो माँ बनकर पराठा बनाती है, रात को कुंडी नहीं लगाती।

दूसरे दिन दोपहर से पहले डोरबेल बजी। माँ किचन में थीं। मैंने गेट खोला तो सविता आंटी साड़ी में खड़ी थीं - लाल, ब्लाउज टाइट, पल्लू सँभला हुआ लेकिन आँखें नंगी। हाथ में मिठाई का बहाना तक नहीं था।

“अजय अभी भी आसमान में है ना?”

“पाँच दिन बाद।”

वो अंदर आईं। जूते नहीं उतारे पहले। माँ को देखकर मुस्कुराईं। “श्रेया, तेरे चेहरे पर रात लिखी है। छुपा मत।”

माँ की करछी रुक गई। “आरव, अपने कमरे जा।”

“आज नहीं जाएगा।” सविता आंटी ने मेरा हाथ पकड़ लिया। गरमी उनकी हथेली में थी। “यह लड़का अब कमरे में छुपने लायक नहीं रहा।

तूने इसे बिस्तर पर उतारा है श्रेया। झूठ मत बोल। कमरे में गंध रहती है, चाल बदल जाती है, आँख झुक जाती है। तू तीनों कर चुकी है।”

माँ का चेहरा सफेद पड़ा। “सविता… घर से निकल। तू हद पार कर रही है।”

“हद तूने पार की जब बेटे का लंड अपनी चूत में लिया।” आंटी की आवाज धीमी थी, घर के बाहर न जाए इतनी, अंदर चीर दे इतनी।

“मैंने पेनड्राइव दी थी। मैंने कहा था जवान लड़के तुझ पर मरते हैं। तू नाराज हुई। फिर दरवाजा खुला छोड़ा। अब मैं बाहर खड़ी रहूँ? दोस्त हूँ तेरी। प्यास मैंने भड़काई तो आग भी देखूँगी।”

माँ ने मेरी तरफ देखा। आँखों में गुस्सा था, डर था, और एक तीसरी चीज — रात वाली हार। “मैंने इसे मना किया था तुझे बताने से।”

“इसने नहीं बताया।” आंटी ने साड़ी का पल्लू ठीक किया। “तूने बताया। तेरी चुप्पी ने बताया। आरव के लंड की चाल ने बताया।” वो सोफे पर बैठीं, टांगें थोड़ी खोलीं।

“अब दो रास्ते हैं। या तो मुझे यहाँ से भगा, दोस्ती तोड़, और डरती रह कि मैं मुँह खोल दूँ। या आज सच रख दे इस घर में। पापा पाँच दिन बाद आ रहे हैं। समय कम है, नाटक मत कर।”

मैं बोला, “आंटी, माँ नहीं चाहतीं कि तीसरा आदमी… तीसरी औरत…”

“मैं आदमी नहीं हूँ बेटा।” वो हँसीं। “मैं वो औरत हूँ जिसने तेरी माँ की चूत की खुजली को नाम दिया। और हाँ - मैंने तेरा लंड देखा है तौलिया के नीचे, गाल के किस में, आँखों की नीयत में। आज सिर्फ देखकर नहीं जाऊँगी।”

माँ दीवार से लग गईं। साँस तेज थी। “आरव के सामने यह सब… मैं माँ हूँ अभी भी।” ये Kamvasna Family Threesome Group Sex Stories in Hindi  आप गरमकहानी डॉट कॉम पर पढ़ रहे है!

“रात को नहीं थी।” सविता आंटी उठीं, माँ के पास गईं, उनका चेहरा दोनों हाथों में लिया। “मैं तुझे नीचा नहीं दिखा रही। मैं शामिल हो रही हूँ। तू अकेली इस पाप को उठाएगी तो टूट जाएगी। तीन में बाँट दे।”

पहला किस माँ के होंठों पर आंटी ने किया। माँ ने धक्का दिया, कमजोर। दूसरा किस लंबा हुआ। माँ की कराह दबकर निकली। मैं खड़ा देखता रहा, लंड पजामे में तनता रहा।

आंटी ने माँ की साड़ी का पल्लू गिराया, ब्लाउज के हुक खोले। माँ के स्तन ब्रा में दबे थे। आंटी ने ब्रा नीचे की और मुँह लगाया।

“आह्ह्ह सविता… मत… आरव देख रहा है… अह्ह्ह…”

“देखे। इसी ने कल तेरी चूत फाड़ी है। अब शर्मा किस बात की?” आंटी ने मुझे आँख से बुलाया। “इधर आ। माँ के पीछे खड़ा हो। हाथ कमर पर रख। भागने मत दे।”

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मैं गया। माँ की कमर मेरी हथेली में आई। उनकी गांड मेरे लंड से सटी। आंटी नीचे झुकीं, माँ की साड़ी और पेटीकोट ऊपर किए, पैंटी खींच दी। माँ की चूत दिन की रोशनी में चमक रही थी — कल के निशान, हल्की सुजन, गीलापन। आंटी ने जीभ लगाई। माँ की कमर मेरे सीने में घुस गई।

“आह्हhhhh… सविता… चाट मत… अह्ह्ह आरव पकड़… गिर जाऊँगी… उह्ह्ह वहीं… क्लिट…”

आंटी चाटती रहीं, दो उंगलियाँ अंदर कीं। चाटते हुए बोलीं, “तेरे बेटे का स्वाद अभी भी है इसके अंदर। नमकीन। गरम। श्रेया तू कितनी भर गई थी रात।”

माँ ने पीछे हाथ बढ़ाकर मेरा पजामा पकड़ा। “आरव… निकाल… खड़ा है ना… अह्ह्ह निकाल मेरे पीछे… लेकिन डाल मत अभी… डर लग रहा है दोनों से…”

पजामा नीचे हुआ। लंड माँ की गांड की दरार में लगा। आंटी ने माँ की टांग और खोली, मुँह चूत पर रखा, हाथ से मेरा लंड पकड़कर माँ की गीली फाँक पर रगड़ा।

“डाल दे बेटा। माँ तैयार है। मुँह से न कहे तो चूत कह रही है।”

माँ ने सिर घुमाया, आँखें भींचीं। “धीरे… दोनों मत एक साथ… अह्ह्ह सविता तू पागल है… आरव अंदर कर… आखिरी नहीं रहा अब कुछ भी…”

नोक पैठी। आधा। पूरा। माँ की चीख आंटी के बालों में दब गई। मैंने पीछे से धक्के शुरू किए। आंटी नीचे से चाट रही थीं — मेरा लंड जब बाहर आता उनकी जीभ लगती, माँ की क्लिट जब अंदर जाता। माँ के स्तन आंटी के हाथ में थे।

“आह्ह्ह… चोद… आरव चोद… सविता देख रही है… अह्ह्ह गंदी हो गई मैं… दोस्त के सामने बेटे से चुद रही हूँ… और तेज़…”

“बोल श्रेया,” आंटी ने नीचे से कहा, “किसकी चूत है?”

“मेरी… बेटे की… अह्ह्ह तेरी भी… जो करना है कर… पापा मत आने दो दिमाग में… अह्ह्ह मार आरव…”

धक्के तेज हुए। साड़ी बिखर गई। आंटी उठीं, अपनी साड़ी की गांठ खोलीं, ब्लाउज फेंका। उनके स्तन माँ से कम नहीं थे। उन्होंने माँ का मुँह अपने निप्पल पर दबाया। माँ चूसने लगीं — रोते-चूसते।

“आह्ह्ह श्रेया… तेरा बेटा पीछे से मार रहा है, तू सहेली का चूचा पी रही है… यही दोस्ती थी हमारी… अह्ह्ह आरव तू माँ की गांड भी देख… लाल कर थप्पड़ से…”

थप्पड़ पड़ा। माँ की चूत कस गई। मैं और गहरा गया। आंटी ने माँ का हाथ अपनी पैंटी में डलवाया। माँ की उंगलियाँ सहेली की चूत में चली गईं, जैसे सालों से जानती हों।

तीनों की साँसें उलझ गईं। सोफे पर, दिन की रोशनी में, पापा की फ्लाइट पाँच दिन दूर। माँ कह चुकी थीं यह घर तीन का पाप नहीं सहेगा। सह रहा था।

आंटी ने मेरा चेहरा पकड़ा, माँ की पीठ के ऊपर से किस किया। मुँह में शराब नहीं थी, माँ की चूत का स्वाद था।

“आज पूरा लेना है बेटा। माँ की चूत, मेरी चूत। बारी-बारी। अंदर ही छोड़ना दोनों में। गैर मर्द नहीं हैं हम। घर की औरतें हैं।”

माँ ने पीछे से मेरी जांघ दबोच ली। आवाज टूटी हुई निकली, “आरव… झड़ मत अभी… सविता को भी… अह्ह्ह मैं देखना चाहती हूँ तू इसे भी चोदता है… फिर मुझमें छोड़… आखिरी झूठ आज खत्म…”

लंड माँ की चूत में धड़क रहा था। सविता आंटी बिस्तर की तरफ खिसक रही थीं, टांगें खोलती हुईं। घर की रेखा तीसरी बार कटने वाली थी।

लंड माँ की चूत में धड़क रहा था जब सविता आंटी सोफे से उठीं और बिस्तर की तरफ खिसकीं। उन्होंने साड़ी पूरी तरह खोल दी, पैंटी टखनों तक उतार दी, और बिस्तर के किनारे बैठकर टांगें फैला दीं।

दिन की रोशनी उनके काले घने जंगल और गीली गुलाबी फाँक पर पड़ रही थी। माँ मेरे सीने से सटी हुई काँप रही थीं। मैंने एक धीमा धक्का और दिया तो उनकी आवाज दबकर निकली।

“आरव, अभी मत झड़ना,” माँ ने पूरा वाक्य कहा, साँस टूटने के बावजूद।

“मैंने तुझसे कहा है कि पहले सविता को ले। मैं देखना चाहती हूँ कि तू उसे कैसे चोदता है। उसके बाद वापस मेरे अंदर आकर छोड़ना। आज का झूठ यहीं खत्म होना चाहिए।”

सविता आंटी हँसीं, दो उंगलियाँ अपनी चूत पर फिराती हुईं। ये Desi Chudai की Pregnant Vasna Kahani आप गरमकहानी डॉट कॉम पर पढ़ रहे है!

“श्रेया सही कह रही है बेटा। तेरा लंड अभी तेरी माँ की चूत में नहाया हुआ है। उसी गीले लंड को निकाल और इधर ला। मैं तैयार हूँ। देख, मैं छुपा नहीं रही।

पापा अजय पाँच दिन बाद आएँगे, तब यह दिन की रोशनी वाले खेल खत्म हो जाएँगे। इसलिए आज पूरा ले ले।”

मैंने धीरे लंड बाहर खींचा। माँ की चूत ने छोड़ते हुए आवाज की, और सफेद-गीला रस उनकी जांघ पर लकीर बनाता हुआ बह निकला।

माँ सोफे पर बैठ गईं, साड़ी कमर तक उखड़ी, स्तन बाहर, आँखें मुझ पर टिकीं। मैं बिस्तर तक गया। सविता आंटी ने मेरा लंड हाथ में लिया, माँ की चूत का रस सूँघा, और जीभ से एक लम्बी चाट लगाई।

“तेरी माँ का स्वाद अभी भी गर्म है,” उन्होंने पूरा वाक्य बोला।

“नमकीन माल और उसकी चूत का पानी मिला हुआ है। अब इसे मेरी चूत में डाल। धीरे से मत पूछ। मैं तेरी माँ की सहेली हूँ, मेहमान नहीं। डाल और चोद।”

मैंने उनकी टांगें और खोलीं। नोक उनकी गीली फाँक पर टिकी। सविता ने खुद कमर आगे की और लंड अंदर खींच लिया। गर्मी अलग थी - तंग, चिकनी, और बेसब्र। जड़ तक बैठते ही उन्होंने मेरे कंधे दबोच लिए।

“आह्ह्ह… अच्छा लंड है तेरा आरव। तेरी माँ ने सच कहा था कि जवान लड़के का माल और होता है। अब चल। मुझे तड़पा मत। मैं सालों से श्रेया की प्यास देख रही हूँ, आज अपनी भी बुझाऊँगी।”

मैंने धक्के शुरू किए। बिस्तर की चर्र-चर्र घर में साफ बज रही थी। पीछे सोफे पर माँ का हाथ अपनी चूत पर था, उंगली घुमाती हुईं, आँखें हमारी जोड़ी पर टिकीं। सविता आंटी हर धक्के पर पूरा वाक्य बोल रही थीं।

“और गहरा कर बेटा। हाँ, वहीं। तेरी माँ देख रही है कि उसकी सहेली कैसे तेरा लंड निगल रही है। श्रेया, देख तू। यही लंड कल रात तेरी कोख में झड़ा था। आज मेरी चूत भी इसे जान रही है।

आरव, तेज़ कर। मैं चुपचाप चुदने वाली औरत नहीं हूँ।”

माँ सोफे से बोलीं, आवाज काँपती हुई लेकिन वाक्य पूरा।

“सविता, तू पागल हो गई है। आरव के सामने ऐसे मत बोल। वह अभी भी मेरा बेटा है। मैं चाहती हूँ कि तू ले, लेकिन मैं मर रही हूँ शर्म से। आरव, उसकी चूत देखकर भी तू मुझसे आँख मत हटा। मैं यहाँ बैठी हूँ।”

मैंने मुड़कर माँ को देखा और धक्का और गहरा दिया।

“माँ, मैं देख रहा हूँ तुम्हें। तुम्हारी चूत से माल अभी भी रिस रहा है और तुम उंगली कर रही हो। सविता आंटी की चूत मुझे कस रही है, लेकिन मैं तुम्हें छोड़कर नहीं आया। आज दोनों को चोदना है, तुमने खुद कहा है।”

सविता ने मेरे चेहरे को अपने दोनों हाथों में लिया और किस किया। मुँह में माँ का स्वाद और उनकी साँस मिली हुई थी। उन्होंने कान में पूरा वाक्य कहा।

“अब माँ को इधर बुला। उसे मेरे ऊपर बिठा। वह चूचा चूसे, मैं तेरा लंड लूँ, और तू दोनों औरतों के बीच का मर्द बन। पापा का फोन आने से पहले यह घर Threesome का सच चख ले।”

माँ उठकर आईं। उनके पैर काँप रहे थे। सविता ने उन्हें बिस्तर पर खींच लिया और माँ को अपनी छाती के पास बैठाया, उलटी दिशा में, ताकि माँ का मुँह सविता के स्तन पर रहे और माँ की गांड मेरे हाथ के पास। मैं सविता को चोदता रहा।

माँ ने आंटी का निप्पल मुँह में लिया और कराहते हुए चूसा। सविता की चूत हर चूसने पर और भींचती गई।

“श्रेया, जोर से चूस,” सविता ने पूरा कहा।

“तेरा बेटा मेरी चूत फाड़ रहा है और तू शर्मा रही है। तूने रात को कुंडी खुली छोड़ी थी। तूने कहा था Threesome का पाप यह घर नहीं सहेगा।

सह तो रहा है। आरव, थप्पड़ मार मेरी जांघ पर और फिर अपनी माँ की गांड पर भी मार। दोनों को याद रहे कि आज कौन चोद रहा है।”

मैंने सविता की मोटी जांघ पर थप्पड़ मारा। आवाज कड़की। फिर माँ की गांड पर हथेली रखी, भींचकर एक थप्पड़ और लगाया। माँ के मुँह से निप्पल छूटा और चीख पूरी निकली।

“आह्ह्ह आरव… माँ को मत मार ऐसे… अह्ह्ह मार… सविता के सामने शर्म नहीं बची मुझमें। तू मेरी गांड लाल कर रहा है और उसकी चूत चोद रहा है। मैं क्या माँ हूँ आज? बोल आरव, पूरा बोल।”

“आज तुम मेरी माँ भी हो और मेरी रंडी भी हो मदारचोद,” मैंने कहा, धक्के तेज़ करते हुए।

“सुबह पराठा बनाने वाली औरत दोपहर में सहेली का चूचा चूस रही है। सविता आंटी की चूत मेरे लंड पर झड़ने वाली है। माँ, तुम देखो और अपनी चूत खुली रखो। अगला माल तुम्हारे अंदर जाएगा।”

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सविता की टांगें काँपने लगीं। उन्होंने मेरे कूल्हे पकड़कर अंदर खींचे। “आरव, अब मत निकालना। मैं झड़ रही हूँ। तेरी माँ के सामने झड़ रही हूँ। मेरी चूत में छोड़। घर की औरत हूँ मैं, गैर नहीं। अंदर भर दे बेटा।”

उनका शरीर अकड़ा। चूत ने लंड जकड़ लिया, लहर पर लहर निचोड़ती रही। मैं रुक गया, गहरी साँस ली, और उनके अंदर झड़ गया। गरम माल की पहली धार उनकी कोख में उतरी। सविता ने दाँत मेरे कंधे में गाड़े और पूरा काँपते हुए कहा।

“भर गया… अह्ह्ह श्रेया देख… तेरा बेटा मेरी चूत में माल छोड़ रहा है… गर्म… गाढ़ा… मैं सालों से तेरी प्यास सुना रही थी, आज अपनी चूत भरवा ली। आरव, पूरा निकाल अंदर। एक बूँद बाहर मत गिरा।”

मैंने दो झटके और दिए, आखिरी माल उनकी गहराई में उतारा, फिर लंड धीरे बाहर खींचा।

सफेद गाढ़ा रस उनकी फैली चूत से बाहर आने लगा, चादर पर धब्बा बनाता। माँ ने वह नज़ारा देखा और खुद को रोक न सकीं। उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा और अपने ऊपर खींच लिया।

“अब मैं,” माँ ने पूरा कहा, आँखें गीली, आवाज सख्त और भिखारिन दोनों।

“सविता की चूत तूने भर दी। मेरी चूत खाली पड़ी है और जल रही है। उसी गंदे लंड को निकालकर मेरे अंदर डाल।

कंडोम की बात मत करना। तू मेरे खून का है। पापा पाँच दिन बाद आएँगे, तब तक मैं यह आग छुपाऊँगी। आज अंदर छोड़, आरव। माँ की चूत में दूसरी बार आज माल उतार।”

मैं उनके ऊपर चढ़ा। माँ ने टांगें खुद फैलाईं। नोक उनकी सुजी हुई फाँक पर लगी, सविता का माल और माँ का पुराना रस दोनों मिलाकर चिकनाई दे रहे थे। एक धक्के में जड़ तक बैठ गया। माँ की चीख इस बार दबाने की कोशिश के बिना निकली।

“आह्हhhhh… भर गया… सविता के बाद मेरी चूत फिर भर गई… आरव चल… अब पूरा चोद… बात मत काट… मैं सुनना चाहती हूँ कि तू किसे चोद रहा है।”

सविता आंटी उनके सिरहाने आ गईं, माँ के स्तन मसलती हुईं, कान में पूरा वाक्य बोलती हुईं। “बोल श्रेया, किसकी चूत चुद रही है? अपने पति की नहीं। अपने बेटे से।

मैंने तेरी उंगली अपनी चूत में ली है। अब सच बोल। पापा का नाम मत ले जब लंड अंदर हो।”

माँ ने आँखें भींचकर कहा, हर शब्द साफ।

“यह चूत आज आरव की है। अजय की नहीं। सविता, तू चुप रहकर चूचा दबा। आरव, तेज़ चोद। थप्पड़ मार। मुझे याद दिला कि मैंने दरवाजा खुद खोला था। आखिरी बार का नाटक खत्म कर। झड़ने दे मुझे पहले, फिर तू अंदर छोड़।”

मैंने गति बढ़ाई। चप-चप की आवाज कमरे में फैल गई। माँ की गांड पर दो थप्पड़ और पड़े। उनकी चूत हर थप्पड़ पर भींचती। सविता ने माँ का हाथ अपनी भरी हुई चूत पर रख दिया, जहाँ से माल रिस रहा था। माँ की उंगलियाँ उस गंद में घुस गईं।

“माँ, तुम्हारी चूत मुझे निचोड़ रही है,” मैंने पूरा कहा। “सविता आंटी का माल मेरे लंड पर लगा है और तुम उसे चाटने जैसी आँखों से देख रही हो। पापा की फ्लाइट पाँच दिन बाद है।

इन पाँच दिनों में तुम ताला लगाओगी या फिर रात को मेरे कमरे आओगी? अभी बोलो, जब मैं तुम्हारे अंदर हूँ।”

माँ की आवाज टूटी, लेकिन वाक्य अधूरा नहीं छोड़ा।

“ताला… अह्ह्ह… ताला लगाने की हिम्मत नहीं बचेगी मुझमें। मैं सुबह माँ बनूँगी। रात को फिर आऊँगी। सविता को घर में मत बुलाना हर दिन… अह्ह्ह नहीं… बुलाना… मैं झूठ नहीं पकड़ पाऊँगी।

आरव, आ गया… माँ झड़ रही है… बेटे के लंड पर दूसरी बार आज… मत निकालना…”

उनका शरीर अकड़ा। चूत ने लंड जकड़कर दूध की तरह निचोड़ा। मैं उनके ऊपर झुका, कमर अड़ाई, और दूसरी बार माँ की कोख में माल छोड़ा - गाढ़ा, गर्म, रुक-रुककर।

माँ ने मेरे पीठ पर नाखून चलाए और सविता का हाथ कसकर पकड़ लिया।

“भर दिया… दोनों में भर दिया आज… अह्ह्ह सविता… मेरे बेटे ने तेरी चूत भी भरी, मेरी भी… अब यह घर तीन का पाप सह रहा है… आरव अंदर धड़कने दे… निकल मत अभी…”

बहुत देर तक तीनों उसी उलझाव में रहे। बाहर गली की आवाजें आ रही थीं। किचन में ठंडी करछी पड़ी थी। पापा का मैसेज फोन की स्क्रीन पर बिना entourage के सो रहा था - पाँच दिन बाद लैंडिंग, समय पर।

मैंने आखिरकार लंड बाहर निकाला। माँ की चूत से सफेद माल निकलकर गांड की दरार तक बह गया। सविता की जांघों पर पहले वाला धब्बा सूखने लगा था। माँ ने चेहरा दीवार की तरफ किया, फिर मुड़ीं और पूरा वाक्य बोला।

“अब उठ। कपड़े पहन। सविता, आज और नहीं। आरव स्कूल-कॉलेज जैसा चेहरा बनाकर बाहर बैठ। अगर पड़ोसी की चाची घंटी बजा दे तो यह घर जल जाएगा। रात को बात करेंगे कि आगे चार दिन कैसे काटने हैं।”

सविता ने साड़ी समेटी, लेकिन पैंटी नहीं पहनी। दरवाजे तक जाकर मुड़ीं और साफ कहा।

“श्रेया, तू भागने वाली नहीं है। आरव, तू सोने वाला नहीं है। कल मैं फिर आ सकती हूँ। पापा आसमान में हैं, हम ज़मीन पर। अगली बार बिस्तर से पहले दरवाजे की कुंडी खुद चेक करना।”

माँ मेरे कंधे पर हाथ रखकर उठीं। नाइटी जैसी सभ्य चीज़ इस वक्त उन पर नहीं थी। उनकी चाल बता रही थी कि चूत भरी हुई है और पैरों के बीच माल सूख रहा है।

रेखा कट चुकी थी। बचा था समय - चार रात, एक फ्लाइट, और वो डर जो अब चुदाई के बाद और साफ महसूस हो रहा था।

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यह कहानी पूरी तरह काल्पनिक है। इसमें दिखाए गए पात्र और घटनाएँ वास्तविक नहीं हैं। साइट केवल 18 वर्ष या अधिक आयु के पाठकों के लिए है।

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