मेरी और मेरी छोटी बहन की मेरे हस्बैंड ने बुर चोदी
sali and wife mast chudai kahani
राहुल की शादी के बाद हम लौट आए। शहर वापस, फ्लैट वापस, दफ़्तर वापस, और वही पुरानी लय — सुबह की चाय, सुरेश का टिफ़िन, शाम की सब्ज़ी, रात का टीवी। पर इस बार उस लय के नीचे एक तार कसा हुआ था, और वो तार था निधि।
अगर आपने मेरी पिछली कहानी नहीं पढ़ी है तो पढ़े की कैसे
मेरे हस्बैंड ने मेरी छोटी बहन की बुर चोदी
।
पहले हफ़्ते तो सब सामान्य रहा। फिर एक रात सुरेश नहाकर आए, बेड पर लेटे, और मैंने देखा कि वो फोन में कुछ देखते हुए मुस्कुरा रहे हैं। मैं पास गई। स्क्रीन पर निधि की स्टोरी थी — बुटीक की शीशे वाली दीवार के सामने खींची हुई, काली टॉप, हाई-वेस्ट जींस, कमर झुकाकर पोज़। नीचे कैप्शन:
“आज कुछ ज़्यादा ही टाइट लग रही हूँ।”
“क्या टाइट?” मैंने पूछा।
“पता नहीं,” सुरेश ने फोन बंद कर दिया। “जींस।”
“झूठ।”
वो हँसे। और उस रात हमने चुदाई की — पहली बार कई हफ़्तों बाद बिना बहाने के। सुरेश ज़ोर से चोद रहे थे, और जब निकाले, तो मैंने उनके कान में कहा, “निधि का नाम लेकर निकालो।”
उन्होंने आँखें बंद करके, मेरे अंदर, हाँफते हुए कहा — “निधि।” और मेरी बुर ने उनके लंड को ऐसे दबाया जैसे कुछ माँग रही हो।
फिर निधि का फोन आया। पहले मेरे पास, फिर सुरेश के पास। शुरू में बातचीत सामान्य थी — मम्मी, घर, काम।
फिर एक दिन निधि ने मुझे अलग फोन किया, रात ग्यारह बजे, और पहला ही वाक्य ये था:
“दीदी, तुमने मुझे बिगाड़ दिया।”
“कैसे?”
“उस रात के बाद, यहाँ के लड़के… सब फीके लग रहे हैं।” उसकी आवाज़ में हँसी थी, पर नीचे कुछ और भी था। “पाँच इंच वाला अब पाँच इंच ही लगता है। बुर अंदर तक खाली रह जाती है, दीदी। जीजू का लंड याद आता है।”
“तो आ जा,” मैंने कहा।
“कब?”
“जब बुलाऊँ।”
फिर उसने मुझे वो बात बताई जिसने पूरा खेल बदल दिया। उसने कहा कि उसके बुटीक की चेन हमारे शहर में नई ब्रांच खोल रही है, और उसका नाम ट्रेनिंग के लिए भेजा जा सकता है। “दस दिन, दीदी। दस दिन तुम्हारे घर में। तेरे जीजू के घर में।”
मैंने फोन काटकर सुरेश को देखा। वो सोफ़े पर बैठे क्रिकेट देख रहे थे।
“निधि दस दिन आ रही है,” मैंने कहा।
सुरेश ने रिमोट रख दिया। स्क्रीन पर बल्लेबाज़ आउट हो गया, पर उन्होंने देखा भी नहीं। “कब?”
“अगले हफ़्ते।”
“कहाँ रहेगी?”
“हमारे घर में,” मैंने कहा, और फिर धीरे से जोड़ा, “बराबर वाले कमरे में।”
बराबर वाला कमरा। हमारे फ्लैट का छोटा कमरा — जिसमें एक पुराना सिंगल बेड था, एक अलमारी, और एक खिड़की। और उस कमरे और हमारे कमरे के बीच… दीवार। बस दीवार। दरवाज़ा नहीं, सिर्फ़ दीवार।
सुरेश ने तीन सेकंड तक मेरी तरफ़ देखा। फिर बोले, “संध्या, तूने प्लान किया है ना?”
“थोड़ा-सा,” मैंने कहा।
“थोड़ा-सा?”
“पूरा,” मैंने कहा, और किचन में चली गई।
उस हफ़्ते मैंने घर को ऐसे सजाया जैसे कोई नई बहू आ रही हो। छोटे कमरे में नया चादर, नया तकिया, नई बेडशीट।
बाथरूम में नया साबुन, नया शैम्पू, दो नए तौलिए। फ्रिज में निधि की पसंद की चीज़ें — आम का अचार, दही, कोल्ड ड्रिंक, और चॉकलेट।
सुरेश ने पूछा, “ये सब किसलिए?”
मैंने कहा, “मेहमान आ रहा है।”
उन्होंने कहा, “मेहमान या मेरी चुदक्कड रंडी साली?” और हम दोनों हँस पड़े।
फिर उस रात मैंने सुरेश से एक ज़रूरी बात कही।
“सुनो,” मैंने बेड पर बैठकर कहा। “अगली बार कुछ चीज़ें बदलेंगी।”
“क्या?”
“एक — पहली बार जल्दबाज़ी थी। इस बार सब्र होगा। दो — निधि की बुर पहले मैं खोलूँगी, अपनी जीभ से। तब तू डालेगा। तीन — निधि ऊपर बैठेगी, पूरा कंट्रोल उसका। और चार —” मैंने उनकी तरफ़ देखा। “निकालना उसके मुँह में।”
सुरेश कुछ देर चुप रहे। फिर बोले, “तू ने निधि से बात की है?”
“की है। उसकी माँग है।”
“और तेरी?”
“मेरी भी वही है,” मैंने कहा। “मुझे अपनी बहन को देखना है — जब वो तेरे लंड को पूरा मुँह में ले।”
सुरेश ने लंबी साँस ली और छत की तरफ़ देखा। “संध्या, तू तो मुझे मार ही डालेगी।”
निधि शुक्रवार की शाम आई। बस से उतरी, एक छोटा ट्रॉली बैग, पीली टॉप, काली स्कर्ट, बाल खुले।
हमारे फ्लैट की तीसरी मंजिल तक सीढ़ियाँ चढ़कर आई और दरवाज़े पर खड़ी होकर पहले मेरी तरफ़ देखा, फिर सुरेश की तरफ़, और फिर बोली, “नमस्ते जीजू।”
“नमस्ते,” सुरेश ने कहा। उनकी आवाज़ सामान्य थी, पर गला सूखा था।
निधि ने अंदर क़दम रखा, चारों तरफ़ देखा, और मेरी तरफ़ मुड़कर धीरे से कहा, “छोटा कमरा कौन-सा है, दीदी?”
मैंने इशारा किया। वो उस कमरे में गई, बैग रखा, फिर निकलकर हमारे कमरे के दरवाज़े पर खड़ी हो गई और अंदर झाँका। बेड। चादर। दो तकिए। उसने सब देखा। फिर पलटकर सुरेश को देखा, और बिना कुछ कहे मुस्कुरा दी।
“क्या?” सुरेश ने पूछा।
“कुछ नहीं, जीजू,” निधि ने कहा। “बस, बेड बड़ा है।”
और वो अपना बैग खोलने चली गई।
रात नौ बजे खाना बना — मैंने खास बनाया, क्योंकि निधि को पता था कि खाने के बाद क्या होना है।
मटन की करी, पराँठे, और सलाद। सुरेश ने फ्रिज से बियर निकाली — दो कैन — और मेरे लिए वाइन। तीनों खाने की मेज़ पर बैठे और बातें करने लगे, पर बातों के नीचे एक तापमान था।
निधि बार-बार सुरेश की तरफ़ देख रही थी। सुरेश बार-बार निधि के होंठों की तरफ़। और मैं दोनों को देख रही थी।
बियर का दूसरा कैन खत्म होते-होते निधि के गाल गुलाबी हो गए और वो हँसते-हँसते सुरेश की बाँह पर हाथ रखकर कुछ कहने लगी। उसका हाथ वहीं रुका रहा।
“जीजू,” उसने कहा, “आपकी बाँह बहुत सख़्त है।”
“जिम जाता हूँ,” सुरेश ने कहा।
“रोज़?”
“रोज़।”
निधि ने उँगली से उनकी बाँह दबाई — दो बार। “तभी,” उसने कहा। और फिर हाथ हटा लिया, जैसे कुछ नहीं हुआ।
मैंने प्लेट उठाई। “बर्तन रख दूँ? या बाद में?”
“बाद में,” निधि ने तुरंत कहा।
“तो क्या करना है?” मैंने पूछा।
निधि ने अपना गिलास रखा और सीधे मेरी आँखों में देखकर कहा, “दीदी, आज वो सब। जो तुमने बताया था।” उसने सुरेश की तरफ़ देखा। “और जो मैंने कहा था।”
सुरेश ने बियर का आख़िरी घूँट लिया और कैन मेज़ पर रख दी। कमरे में सन्नाटा था।
“तो पहले नहाना है,” मैंने कहा। “पूरे दिन की बस की धूल उतारनी है।”
हमारे फ्लैट का बाथरूम छोटा है। चार फुट का शॉवर एरिया, ऊपर एक बल्ब, और एक गीज़र जो बीच में कभी-कभी बंद हो जाता है। तीन लोगों के लिए वो जगह तंग थी — और शायद इसीलिए इतनी काम की।
निधि ने पहले दरवाज़ा बंद किया, फिर सुरेश की तरफ़ देखकर पूछा, “बंद रखूँ या खुला?”
“बंद रख,” मैंने कहा। “पड़ोसन की खिड़की सामने है।”
निधि हँस पड़ी। “दीदी, तुमने ये भी सोच रखा है।”
गीज़र चला। पाँच मिनट में बाथरूम भाप से भर गया और शीशे पर पानी की बूँदें जमने लगीं। निधि ने पीली टॉप सिर से निकाली।
फिर स्कर्ट की ज़िप। फिर ब्रा की हुक। और जब ब्रा गिरी, तो उसके दूध ने हल्का-सा हिलकर अपनी जगह ली — भारी, गोल, और उन पर वो मुंहजोर निपल्स जो पहली बार की याद दिला रहे थे।
फिर पैंटी। फिर सब। निधि नंगी, भाप के बीच खड़ी, और सुरेश उसे देख रहे थे।
“जीजू, तुम भी,” निधि ने कहा।
सुरेश ने कमीज़ उतारी। पेट, सीना, बाँहें — सब खुला। फिर पैंट। और जब शॉर्ट्स नीचे गई, तो लंड आधा खड़ा था, बाईं तरफ़ झुका हुआ, भारी।
निधि ने देखा और अपनी जीभ से होंठ गीले किए। दो महीने पहले वो इसे बेड पर देख चुकी थी — और उसके बाद हर रात बंद कमरे में याद कर चुकी थी।
फिर मैंने भी नाइटी उतारी। तीनों नंगे। और उस छोटे बाथरूम में एक ऐसी चुप्पी थी जो चीख से ज़्यादा तेज़ थी।
सुरेश ने शॉवर खोला। गरम पानी पहले सुरेश के सिर पर गिरा, फिर उनके सीने पर, फिर निधि के कंधों पर। निधि ने आँखें बंद कर लीं और पानी को अपने चेहरे पर गिरने दिया।
गरम पानी उसके दूध पर से बहता, निपल्स से टकराकर नीचे गिरता। मैंने अपने हाथ में साबुन लिया और निधि की पीठ पर लगाने लगी।
उसकी पीठ। गेहुँई, मुलायम, कमर पर एक गड्ढा, और नीचे कूल्हे की गोलाई जो हाथ में ऐसे आई जैसे कोई फल।
मैंने साबुन को उसकी कमर से नीचे सरकाया, नितंबों पर घुमाया, और फिर जाँघों के पीछे तक ले गई। निधि ने गर्दन पीछे की और मेरी तरफ़ देखा।
“दीदी, तुम्हारे हाथ अच्छे हैं।”
“अभी तो शुरू हुआ है,” मैंने कहा।
फिर सुरेश ने निधि के सामने घुटना टेका और अपने हाथों में साबुन लेकर उसके सीने पर लगाया।
दोनों दूध भरे हाथों में लिए, ऊपर उठाए, नीचे छोड़े, और अँगूठों से निपल्स पर साबुन फेरा।
निधि ने सुरेश के सिर पर हाथ रखकर उसे अपने सीने पर दबा दिया। सुरेश ने मुँह बढ़ाकर एक निप्पल को होंठों में लिया और साबुन के झाग के साथ चूसने लगे।
“जीजू,” निधि ने आँखें बंद किए हुए कहा, “ये तो फोरप्ले ही हो गया नहाते-नहाते।”
“होने दो,” सुरेश ने मुँह भरकर कहा।
मैंने पीछे से अपने दोनों हाथ निधि के कूल्हों पर रखे और उसके नितंबों के बीच से नीचे उँगली सरकाई।
गरम पानी में साबुन की फिसलन थी, और मेरी उँगली निधि की बुर के होंठों पर आकर रुक गई। निधि ने झटका खाया।
“दीदी…”
“आज तेरी बुर का ब्याह होगा,” मैंने उसके कान में कहा। “पहले मेरी जीभ, फिर जीजू का लंड।”
निधि ने मेरा हाथ पकड़कर दबा दिया।
नहाने के बाद सुरेश ने दोनों को तौलिये से पोंछा — पहले निधि को, फिर मुझे। निधि के बाल गीले थे और माथे पर चिपके हुए।
उसके शरीर पर पानी की बूँदें थीं जो तौलिये के बाद भी कंधों पर रह गईं।
फिर हम तीनों कमरे में आए।
कमरे में एसी चालू था, तापमान चौबीस पर। बेडसाइड लैंप जल रहा था। और बेड के पीछे वाली एलईडी स्ट्रिप पर मैंने वो हल्का गुलाबी रंग रख दिया था जो निधि को पसंद है — क्योंकि उसने एक बार फोन पर मुझे बताया था।
मैंने रसोई से एक कटोरी नारियल का तेल लाई, उसे माइक्रोवेव में बीस सेकंड गरम किया, और बेड के पास रख दिया। साथ में एक साफ़ तौलिया — तेल के लिए, चादर बचाने के लिए।
निधि ने कटोरा देखकर पूछा, “ये किसलिए?”
“तेरे लिए,” मैंने कहा। “लेट जा। पेट के बल।”
निधि ने मेरी तरफ़ देखा, फिर सुरेश की तरफ़। फिर वो बेड पर चढ़ी और पेट के बल लेट गई। बाल एक तरफ़ कर लिए, गाल तकिये पर, हाथ सिर के नीचे।
उसकी पीठ, कमर, नितंब, और जाँघें — सब बेडसाइड लैंप की पीली रोशनी में खुली पड़ी थीं।
मैंने तेल हाथ में लिया और उसकी पीठ के बीच से नीचे डाला। ठंडा नहीं था — गुनगुना था। निधि ने एक छोटी सी साँस ली और कंधे ढीले कर दिए।
फिर मैंने हाथ फेरने शुरू किए। कंधों से कमर तक, लंबे, दबाव वाले, धीमे। तेल चमकने लगा।
उसकी पीठ की रीढ़ की हड्डी पर मेरी हथेली सरकी, फिर दोनों तरफ़ की मांसपेशियों पर अँगूठों से गोल घुमाए। निधि कराहने लगी — वो कराह जो दर्द की नहीं, ढीलने की होती है।
“दीदी, तुम ये कहाँ से सीखी?”
“तेरे जीजू से,” मैंने कहा। “वो मेरी कमर दबाते हैं, तो मैंने देख लिया।”
निधि हँसी। फिर मेरे हाथ नीचे गए। कमर के गड्ढे पर अँगूठे टिकाए, फिर दोनों तरफ़ से कूल्हों पर हाथ फैलाए। उसके नितंब — भरे हुए, गोल, और तेल से चमकते।
मैंने दोनों हाथों से उन्हें पकड़कर ऊपर की तरफ़ दबाया और छोड़ा। निधि ने कूल्हे उठा दिए, जैसे शरीर खुद माँग रहा हो।
“अब तू,” मैंने सुरेश की तरफ़ देखकर कहा।
सुरेश बेड के किनारे बैठ गए और उन्होंने अपने बड़े हाथों में तेल लिया। और फिर उनके हाथ निधि की पीठ पर पड़े — मेरे से दोगुने बड़े, दोगुने भारी। निधि ने पूरा शरीर एक झटके में ढीला कर दिया और मुँह तकिये में दबा दिया।
सुरेश ने उसकी पीठ पर तेल फैलाया, फिर कमर पर दोनों अँगूठे रखकर गहरा दबाव दिया — ऊपर से नीचे, तीन बार। निधि की आवाज़ तकिये के नीचे से निकली।
“जीजू… आह…”
फिर सुरेश के हाथ नीचे सरके। नितंबों पर। उन्होंने दोनों हाथों से निधि के कूल्हे थामे, अँगूठे बीच की खाई में डाले, और धीरे-धीरे ऊपर-नीचे फेरे। निधि की साँस भारी हो गई।
फिर उन्होंने अँगूठे नीचे सरकाए — जाँघों के पीछे, घुटनों के पीछे, और फिर पिंडलियों तक। पूरा शरीर तेल से चमक रहा था, और उस तेल में बेडसाइड लैंप का पीला रंग भरा हुआ था।
“पलट,” मैंने कहा।
निधि करवट लेकर पीठ के बल हो गई। अब सामने सब खुला था। दोनों दूध तेल से चिकने, निपल्स खड़े, पेट सपाट और नाभि के नीचे तेल की एक पतली लकीर, और उसके नीचे वो जगह — बालों के नीचे छिपी, गीली, सूजी हुई बुर।
सुरेश ने दोनों हाथों में तेल लिया और सीधे उसके दूध पर रखा। निधि ने आँखें बंद कर लीं। सुरेश ने दूध को दोनों हाथों से ऊपर उठाया, तेल फैलाया, निपल्स पर अँगूठे घुमाए, और फिर उन्हें उँगली और अँगूठे के बीच लेकर हल्का खींचा। निधि की पीठ बेड से उठ गई।
“निपल्स मत खींचो, जीजू,” वो हाँफी।
“तो क्या करूँ?”
“चूसो।”
सुरेश झुके और एक निप्पल मुँह में ले लिया। तेल, नमक, और उसकी खाल का स्वाद। उन्होंने जीभ से निप्पल को तालू पर दबाया और हल्के दाँतों से नोचा। निधि ने सुरेश के बाल पकड़कर उन्हें अपने सीने पर और दबा दिया, और उसकी जाँघें बेड पर बेचैन होकर रगड़ने लगीं।
फिर मैंने उसकी जाँघें खोलीं।
दोनों हाथों से उसके घुटने बाहर किए, और नीचे झुकी। निधि की बुर सामने थी — पूरी खुली, गीली, गुलाबी-भूरी, और उसके होंठ सूजे हुए। मैंने उँगली से पहले बाहर पोंछा — तेल और उसका रस दोनों मिल गए — फिर होंठों पर जीभ रखी।
निधि ने झटका खाया।
“दीदी!” उसकी आवाज़ ऊँची हो गई। “तुम…”
“क्या?”
“औरत का मुँह… मुझे पहली बार।”
“तो पहली बार का मज़ा ले,” मैंने कहा, और जीभ नीचे से ऊपर एक लंबी लकीर खींची।
निधि की दोनों जाँघें काँपीं और उसने मेरे बाल पकड़ लिए। मैंने जीभ से उसके होंठों के बीच चीरा दिया, ऊपर की तरफ़ बढ़ी, और उस छोटी गाँठ पर पहुँची। वहाँ चारों तरफ़ गोल घुमाया, फिर उसे होंठों में लेकर हल्के-हल्के चूसा।
“आह… दीदी… दीदी…”
निधि की कमर बेड से ऊपर उठने लगी। मैंने बाएँ हाथ की दो उँगलियाँ उसकी बुर के मुँह पर रखीं और धीरे से अंदर डालीं। अंदर गरम, गीला, और कसा हुआ। मैंने उँगलियाँ ऊपर की तरफ़ मोड़कर दबाव डाला — वो जगह — और साथ-साथ जीभ से गाँठ चूसती रही।
निधि तीस सेकंड में पागल हो गई। उसने दोनों हाथ मेरे सिर पर रखकर मुझे अपनी बुर पर दबा दिया, और कमर को बेड से उठाकर गोल-गोल घुमाने लगी, जैसे मेरे मुँह पर खुद को रगड़ रही हो।
“दीदी… रुको मत… दीदी…”
सुरेश ऊपर से सब देख रहे थे। उनका लंड पूरा खड़ा था, ऊपर की तरफ़ तना हुआ, और टिप पर एक बूँद। उन्होंने अपनी कलाई से उसे सहलाया और आँखें मूँद लीं।
दो मिनट बाद निधि झड़ पड़ी। उसकी बुर ने मेरी उँगलियों को तीन बार कसकर दबाया, उसकी जाँघें मेरे कानों पर आकर बंद हो गईं, और वो लंबी, टूटी हुई आवाज़ में कराहती रही। जब ढीली हुई, तब मैंने मुँह हटाया और उसकी जाँघ पर चूमकर उठ गई।
“दीदी,” निधि ने आँखें बंद किए हुए, हाँफते हुए कहा, “तुमने तो मुझे मार दिया।”
“अभी तो जीजू बाक़ी है,” मैंने कहा, और मुँह पोंछकर सुरेश की तरफ़ देखा।
निधि ने आँखें खोलीं। उसने सुरेश को देखा — खड़े हुए, लंड ऊपर उठा हुआ, दस इंच, चमकता हुआ। और फिर उसने बहुत धीरे से कहा, “जीजू, आ जाओ।”
सुरेश बेड पर आए। घुटनों के बल निधि की टाँगों के बीच बैठे। उन्होंने अपने लंड को निधि की बुर के होंठों पर रखा — सिर्फ़ रखा, अंदर नहीं डाला। ऊपर-नीचे रगड़ा। तेल, उसका रस, और सुरेश की लार — तीनों मिलकर फिसलन बना रहे थे।
निधि ने कूल्हे हिलाकर खुद को उस पर सेट किया।
“जल्दी करो, जीजू,” उसने कहा।
“इस बार तू कर,” सुरेश ने कहा। “मैं आज तेरे नीचे रहूँगा।”
निधि की आँखें चमकीं। वो उठी, सुरेश को धक्का देकर बेड पर पीठ के बल लिटाया, और उनके ऊपर चढ़ गई। घुटने सुरेश की जाँघों के दोनों तरफ़, हाथ उनकी छाती पर। फिर उसने पीछे हाथ बढ़ाकर सुरेश का लंड पकड़ा — दोनों हाथों से, जैसे पहली बार में पकड़ा था — और उसे उठाकर अपनी बुर के मुँह पर रखा।
फिर वो धीरे-धीरे नीचे बैठी।
पहला इंच। उसकी साँस फूली। दूसरा। तीसरा। चौथा। पाँचवें पर उसने हल्की आवाज़ निकाली। छठा, सातवाँ, आठवाँ — और फिर वो रुकी, हाँफती हुई, दोनों हाथ सुरेश की छाती पर टिकाए हुए।
“जीजू,” उसने कहा, “पूरा अंदर है।”
“पूरा?” सुरेश ने पूछा।
निधि ने अपना एक हाथ नीचे लाकर अपनी नाभि के नीचे रखा। “यहाँ तक,” उसने कहा। और फिर उसने आँखों में आँसू लिए, हँसते हुए कहा, “दो महीने से यही याद था, जीजू।”
फिर वो हिलने लगी।
शुरू में धीरे — ऊपर आधा, नीचे पूरा। कमर गोल घुमाती हुई, बेड की चादर को अपने घुटनों के नीचे जकड़े हुए। उसके दूध हर बार ऊपर-नीचे हो रहे थे और निपल्स सुरेश की छाती पर रगड़ खा रहे थे। सुरेश ने हाथ बढ़ाकर उन्हें पकड़ा, पर निधि ने उनके हाथ हटा दिए।
“नहीं,” उसने कहा। “आज मैं चलाऊँगी। हाथ नीचे रखो।”
सुरेश ने हाथ सिर के नीचे रख लिए, और हँस दिए। “बड़ी हुकूमत करने लगी है।”
“सीख गई हूँ,” निधि ने कहा, और फिर अपनी रफ़्तार बढ़ा दी।
अब वो उछलने लगी। पूरा ऊपर, पूरा नीचे। उसकी बुर के होंठ हर बार लंड को चूमकर छोड़ते और फिर निगल लेते। आवाज़ आने लगी — चप, चप, चप — तेल और रस की गीली आवाज़। बेड की लकड़ी चरमराने लगी। निधि के बाल उछल-उछलकर चेहरे पर आ रहे थे और वो उन्हें पीछे झटक रही थी।
मैं बेड के किनारे बैठी थी और देख रही थी। देख रही थी कि मेरी बहन के अंदर मेरे पति का लंड कैसे ऊपर-नीचे हो रहा है। देख रही थी कि हर बार जब वो पूरा नीचे बैठती है, तो उसकी बुर के होंठ लंड की जड़ पर चिपक जाते हैं। देख रही थी कि उसकी जाँघों के अंदर तक पसीना और तेल मिलकर चमक रहे हैं।
मेरी अपनी बुर में फिर पानी भर आया। मैंने दो उँगलियाँ अंदर डालीं और देखते-देखते खुद को चोदने लगी।
निधि ने मुड़कर मुझे देखा। “दीदी, तुम भी?”
“तू अपना काम कर,” मैंने कहा।
निधि ने मुस्कुराकर सिर पीछे किया और अपनी गति बदली। अब वो पूरी तरह बैठकर, कूल्हे आगे-पीछे कर रही थी — ग्राइंडिंग। लंड अंदर पूरा, और वो अपनी बुर को उस पर रगड़ रही थी, ऊपर की तरफ़ दबाव डालती हुई। सुरेश की आँखें बंद हो गईं और उनके हाथ अपने आप ऊपर आकर निधि की कमर पर पकड़ बना गए।
“जीजू,” निधि ने कहा, “लंड फड़क रहा है।”
“हाँ,” सुरेश ने दाँत भींचकर कहा।
“निकलने वाला है?”
“नहीं। रोक रहा हूँ।”
निधि रुक गई। उसने सुरेश के ऊपर झुककर उनके होंठ चूसे, फिर गाल, फिर गर्दन। और फुसफुसाई, “रोको मत। अभी और है।”
फिर वो उठी और पलट गई।
रिवर्स काउगर्ल। पीठ सुरेश की तरफ़, घुटने दोनों तरफ़ चौड़े, हाथ बेड पर। नीचे बैठी — इस बार एक ही बार में, पूरा। सुरेश ने कराह मारी।
इस एंगल पर निधि के दूध सामने लटक रहे थे, और मेरी आँखों के सामने थे। मैं उठकर पास गई और बेड पर घुटनों के बल बैठकर आगे झुक गई, और निधि के एक निप्पल को मुँह में ले लिया।
निधि चीख पड़ी। “दीदी!”
मैंने दूसरे निप्पल को उँगलियों में लिया और दबाया, और मुँह से पहले वाले को चूसने लगी। निधि के नीचे सुरेश का लंड ऊपर-नीचे हो रहा था और ऊपर उसके निपल्स पर मेरे होंठ। निधि बीच में फँस गई, और उसने सिर पीछे किया, आँखें बंद कीं, और लंबी आवाज़ में कराहने लगी।
सुरेश नीचे से धक्के मार रहे थे — जितना उनकी कमर से हो पाता। निधि उनके ऊपर कूद रही थी। और मैं उसके दूध चूस रही थी। तीनों की गति एक हो गई, और कमरे में सिर्फ़ चप-चप, हाँफ, और बेड की चरमराहट बची।
पाँच मिनट बाद निधि की जाँघें काँपने लगीं। उसने नीचे हाथ रखकर सुरेश की जाँघ पर मुट्ठी बनाई और कहा, “जीजू, निकल जाऊँगी।”
“निकल जा,” सुरेश ने कहा।
“और तुम?”
“मैं रोक रहा हूँ। तेरे मुँह के लिए।”
निधि ने पीछे मुड़कर उन्हें देखा, और उसकी आँखों में वो चीज़ थी जो मैंने पहली बार में देखी थी — खुलेपन की कराह। फिर वो ऊपर-नीचे तेज़ करने लगी, पूरी ताक़त से, और दस धक्कों के बाद उसकी बुर ने सुरेश के लंड को तीन बार जकड़कर दबाया और वो गिर पड़ी — सुरेश की छाती पर, पूरी तरह पिघली हुई, हाँफती हुई।
सुरेश उसके अंदर अभी भी थे, और अभी भी सख़्त।
निधि दो मिनट तक वैसे ही पड़ी रही, साँस लेती हुई। फिर वो उठी — धीरे से, जैसे लंड से अलग होते हुए डर हो। जब लंड बाहर आया, तो दोनों की चीख जैसी आवाज़ हुई — गीली, चिपचिपी। लंड चमक रहा था, निधि की बुर का रस उस पर लगा हुआ, और निधि की बुर खुली पड़ी थी — लाल, सूजी, हाँफती हुई।
निधि ने पलटकर सुरेश को देखा, और बिना एक पल गँवाए बेड से नीचे उतरी। फिर वो सुरेश के पैरों के पास घुटनों के बल बैठ गई। बेड का किनारा उसकी छाती तक था। सुरेश बेड पर बैठे थे और उनका लंड सामने खड़ा था — उनके पेट से टिका हुआ, दस इंच, भारी।
निधि ने पहले उसे दोनों हाथों से पकड़ा। फिर एक हाथ से जड़ पर कसकर पकड़ रखा और दूसरे से नीचे के थैले को सहलाया। फिर उसने जीभ निकालकर नीचे से ऊपर तक एक लंबी लकीर खींची — जड़ से टिप तक — और टिप पर पहुँचकर उसे होंठों में लेकर चूसा।
सुरेश की पीठ सीधी हो गई। उन्होंने निधि के बालों में हाथ डाला।
“निधि…”
“चुप, जीजू,” निधि ने कहा, और फिर उसने लंड को मुँह में लिया।
पहले सिर्फ़ टिप। फिर दो इंच। फिर चार। फिर छह। निधि ने अपना मुँह ढीला किया, गला खोला, और आँखें बंद करके नीचे जाने लगी। सात इंच तक गई, फिर गला भरा और वो रुकी। आँखों से पानी आ गया। पर हटी नहीं।
मैं पास आकर बेड पर बैठ गई, ठीक सुरेश के पीछे। मैंने उनके कंधे पर हाथ रखा और निधि को देखने लगी।
निधि ने मुँह से निकाला, लंबी साँस ली, और फिर दोबारा अंदर लिया। अब वो लय बनाने लगी — ऊपर-नीचे, हर बार गहरे तक।
उसकी लार लंड पर लगकर नीचे बहती और ठुड्डी तक आ जाती। हर बार जब वो नीचे जाती, तो एक गड़गड़ाहट जैसी आवाज़ उसके गले से निकलती — घर्र। और हर बार जब ऊपर आती, तो लंड चट से बाहर आता और निधि उसे होंठों से चूम लेती।
सुरेश की साँसें छोटी हो गईं। उन्होंने निधि के बालों में दोनों हाथ डालकर उसका सिर हल्का पकड़ा और उनकी कमर अपने आप धक्के मारने लगी — छोटे, धीमे धक्के, मुँह के अंदर।
“निधि, रुक जा, वरना यहीं…” सुरेश ने कहा।
निधि ने मुँह से लंड निकाला, चट-चट दो बार चूमा, और ऊपर देखा। उसके होंठ सूजे हुए, चमकते, और ठुड्डी पर लार की एक लकीर।
“जीजू,” उसने कहा, “निकालो। मुँह में।”
“पूरा?”
“पूरा,” निधि ने कहा। “और हटना नहीं।”
फिर उसने दोबारा लंड मुँह में लिया — इस बार पूरा, गहरा, आँखें बंद किए, और एक हाथ सुरेश की जाँघ पर रखकर उन्हें रोका ताकि वो पीछे न हटें। दूसरे हाथ से उसने लंड की जड़ को पकड़कर हल्का दबाया।
मैंने झुककर सुरेश के कान में धीरे से कहा, “निकाल दे। मेरी बहन तेरे लंड पर भूखी है।”
सुरेश की आँखें बंद हो गईं।
दस सेकंड बाद उनकी पीठ कसी, गर्दन की नसें उभरीं, और पहला झटका निकला — निधि के मुँह में, सीधे गले के पास। निधि ने घूँट भरा। दूसरा झटका। तीसरा। सुरेश की जाँघें काँपीं और उन्होंने दोनों हाथ निधि के सिर पर रख दिए, उसे दबाए हुए।
निधि एक बूँद भी नहीं गिरने दी। वो वैसे ही रुकी रही — आँखें बंद, मुँह भरा हुआ, साँस नाक से। जब सुरेश की कमर ढीली हुई और लंड फड़कना बंद हुआ, तब उसने धीरे-धीरे मुँह से निकाला और नीचे देखा।
फिर उसने मुँह खोला और मुझे दिखाया — अंदर सफ़ेद, गाढ़ा, भरा हुआ। और फिर उसने बहुत धीरे से सब निगल लिया। आख़िर में जीभ से होंठ साफ़ किए और सुरेश के लंड को एक बार और चूमकर ऊपर आई।
“जीजू,” उसने कहा, आवाज़ भारी, “दो महीने से यही इंतज़ार था।”
सुरेश ने उसे खींचकर बेड पर ले लिया और उसके माथे पर चूमा।
अब बाक़ी थी मैं।
मैं बेड पर पीठ के बल लेट गई। कोई शब्द नहीं। कोई माँग नहीं। सुरेश मेरे ऊपर आए, और निधि मेरे बराबर लेटकर मेरा हाथ पकड़ लिया।
सुरेश का लंड अभी भी खड़ा था — निकालने के बाद भी, क्योंकि वो ऐसे ही हैं। उन्होंने अपने लंड को मेरी बुर के होंठों पर रगड़ा — जो उस वक़्त पूरी तरह गीली थी, आठ साल की आदत के साथ।
“डालो,” मैंने कहा।
और वो अंदर आए। पूरा, एक बार में, बिना रुके — क्योंकि मेरी बुर आठ साल से उनके लिए ढली हुई है। और फिर वो हिले, धीरे-धीरे, मेरी गर्दन पर होंठ रखकर।
निधि मेरे बराबर लेटी थी और देख रही थी। उसने मेरी बुर की तरफ़ देखा — जहाँ सुरेश का लंड अंदर-बाहर हो रहा था — और उसने धीरे से कहा, “दीदी, तुम्हारी बुर कितनी खुली है।”
“आठ साल में खुली है,” मैंने हाँफते हुए कहा।
निधि ने हाथ बढ़ाकर मेरे दूध को पकड़ा और मेरे निप्पल को अँगूठे-उँगली के बीच लेकर दबाया, और फिर झुककर उसे चूस लिया। मेरी पीठ बेड से उठ गई।
अब मेरे अंदर लंड, और मेरे निपल्स पर मेरी बहन का मुँह। सुरेश मेरे ऊपर, निधि मेरे बराबर। मैंने दोनों हाथ फैलाकर निधि को अपने पास खींच लिया और उसका चेहरा चूम लिया — होंठों पर। निधि ने पहले झिझकी, फिर चूसने लगी।
दो बहनें, एक बेड पर, एक आदमी के नीचे, एक-दूसरे को चूमते हुए।
सुरेश ये देखकर और पागल हो गए। उनकी गति बढ़ गई। धक्के तेज़, लंबे, गहरे। मेरी बुर की आवाज़ पूरे कमरे में गूँजने लगी। निधि मेरे निपल्स चूस रही थी और मेरी कमर उनकी तरफ़ उठ रही थी।
तीन मिनट में मैं झड़ पड़ी — लंबी, काँपती हुई, आँखों से पानी निकलते हुए। और सुरेश मेरे अंदर निकल गए — दूसरी बार, पूरा, गहरा। मैंने महसूस किया, गर्म, भारी, भरता हुआ। और मैंने उन्हें जकड़कर रोक लिया, जैसे निधि ने रोका था।
रात तीन बजे तीनों बेड पर गिरे पड़े थे। निधि बीच में, सुरेश एक तरफ़, मैं दूसरी तरफ़। चादर खिसकी पड़ी थी, पसीना सूख रहा था, और तेल की महक पूरे कमरे में भरी हुई थी। एसी चौबीस पर गुनगुना ठंडा झोंका दे रहा था, और एलईडी स्ट्रिप अभी भी उसी गुलाबी रंग में जल रही थी।
निधि ने आँखें बंद किए हुए कहा, “दीदी।”
“हाँ।”
“मुँह में पहली बार लिया।”
“अच्छा लगा?”
“बहुत।” वो करवट लेकर मेरी तरफ़ मुड़ी और मेरी छाती पर सिर रख दिया। “जीजू ने रोका नहीं। दीदी, तुमने भी नहीं रोका।”
“क्यों रोकती?”
“पहली बार में तुम दरवाज़े पर खड़ी थीं। आज तुम बेड पर थीं।” उसने मेरी कमर पर हाथ रखा। “फर्क पता है?”
“पता है,” मैंने कहा।
“अब ये एक रात नहीं है,” निधि ने कहा। “अब ये आदत है।”
सुरेश ने आँखें बंद किए हुए हँसकर कहा, “आदत अच्छी है।”
सुबह सात बजे की हल्की रोशनी खिड़की से आई। बालकनी के परे नीचे सड़क पर दूध वाला घंटी बजा रहा था और किसी फ्लैट से प्रेशर कुकर की सीटी आ रही थी। निधि पहले उठी। उसने चादर खींचकर अपने शरीर पर लपेटी, बालकनी के दरवाज़े पर गई, और खोल दिया।
ठंडी हवा अंदर आई। और निधि वहीं खड़ी हो गई — चादर में लिपटी, बाल बिखरे, और पीठ पर तेल की चमक अभी भी बाक़ी। सुरेश ने उठकर उसे देखा, और उनकी सुबह की सूजन वाली लंड फिर हिल गई।
“जीजू,” निधि ने बिना पलटे कहा, “तुम देख रहे हो।”
“हाँ।”
“अच्छा कर रहे हो,” उसने कहा, और कमर ज़रा झुकाकर बालकनी की रेलिंग पर हाथ रख दिए। चादर खिसककर उसकी पीठ पर से नीचे आ गई, और उसका पूरा पीछा खुल गया — कमर, कूल्हे, जाँघें।
सुरेश बेड से उठे। मैंने आँखें आधी खोलीं और देखा। सुरेश निधि के पीछे गए, उसकी कमर पकड़ी, और बिना कुछ कहे लंड को उसके नितंबों के बीच रखकर नीचे सरकाया — और अंदर डाल दिया।
निधि ने रेलिंग पकड़कर कराह मारी। सुबह की चुदाई — धीमी, आलसी, गहरी। सुरेश ने उसकी कमर पर दोनों हाथ रखकर धीरे-धीरे धक्के मारे, और निधि ने बालकनी की रेलिंग पर झुककर उन्हें झेला। नीचे सड़क पर कोई देखता तो क्या देखता — किसी तीसरी मंजिल की बालकनी में एक औरत झुकी हुई, और उसके पीछे एक आदमी।
“दीदी,” निधि ने अंदर देखकर हँसते हुए कहा, “तुम्हारे जीजू ने मुझे सुबह-सुबह उठाकर चोद डाला।”
“अच्छा ही किया,” मैंने कहा, और चादर खींचकर सो गई।
दस बजे नाश्ते के बाद मैंने अपना फोन निकाला।
“निधि, एक बात पूछूँ?”
“पूछो।”
“तेरे जीजू ने रात में अपना फोन वॉटर ग्लास पर टिकाया था, याद है?”
निधि रुक गई। “वीडियो?”
“वीडियो,” मैंने कहा, और फोन घुमाकर उसे दिखाया। पूरी रात — बाथरूम से लेकर आख़िर तक। चालीस मिनट।
निधि ने फोन छीन लिया। स्क्रॉल करने लगी। जब वो हिस्सा आया जहाँ वो घुटनों के बल बैठी है और उसका मुँह भरा हुआ है, तो उसने हाथ से मुँह ढक लिया।
“हे भगवान,” वो बोली। “मेरा चेहरा ऐसा है?”
“अच्छा है,” सुरेश ने कहा, चाय की चुस्की लेते हुए। “बहुत अच्छा है।”
“जीजू!” निधि ने तकिया उठाकर उन पर मार दिया।
“सुन,” मैंने कहा। “ये किसी को नहीं दिखाएँगे। बस हम तीन।” और फिर जोड़ा, “अभी के लिए।”
निधि ने फोन वापस दिया और उसकी आँखों में वो चमक थी जो पहली रात के बाद थी। “दीदी,” उसने कहा, “एक चीज़ पक्की है।”
“क्या?”
“मैं ट्रेनिंग खत्म होने पर इस शहर में ट्रांसफ़र माँग लूँगी।” उसने सुरेश की तरफ़ देखा, फिर मेरी तरफ़। “दस दिन यहाँ हूँ। और ये दस दिन बस हमारे हैं।”
उसी शाम, चाय के बाद, निधि ने अपना फोन मेज़ पर रखा और एक नोट खोलकर पढ़ने लगी। पूरी लिस्ट। उसकी लिस्ट।
एक। “अगली बार सुबह की चुदाई नहीं, दोपहर की। बारिश में। बालकनी का दरवाज़ा खुला। और तुम दोनों मेरे पीछे-आगे रहना।”
दो। “जीजू, अगली बार जब निकालो, तो मुँह में ही नहीं — चेहरे पर भी। और मुँह धोने नहीं देना, दीदी। पहले चूम लेना।”
ती। “दीदी, तुम्हें भी एक बार जीजू के ऊपर बैठकर मुझे देखना है। मुझे देखना है तुम्हें कैसे चलाती हो। आज तुमने देखा, कल मैं देखूँगी।”
चार। “और एक बात, जो अभी तक किसी ने नहीं कही।” निधि ने फोन बंद किया और मेज़ पर हाथ रख दिया। “दीदी, तुमने कहा था कि मेरी बुर टाइट है।”
“हाँ।”
“और जीजू ने कहा था कि दस इंच फैलाता है।”
“हाँ।”
निधि ने अपनी कलाई घुमाई, जैसे तैयारी कर रही हो। “तो अगली बार, जब दस इंच अंदर जाएगा, मुझे पूरा फैल जाना है। बिना रुके। बिना ‘रुको जीजू’ कहे।” उसने सुरेश की तरफ़ देखा। “और जीजू को फाड़ना है। जितना हो सके, उतनी बार।”
सुरेश ने चाय का कप रख दिया। “निधि, मैं तैंतीस का हूँ।”
“तो?”
“तो तेरे पीछे-पीछे चलूँगा,” सुरेश ने कहा।
निधि हँस पड़ी।
और फिर, चाय खत्म होते-होते, उसने एक पाँचवीं बात कही — जो शायद सबसे बड़ी थी।
“दीदी, जीजू, एक वीकेंड। तीन दिन। कोई होटल, शहर से बाहर। एक कमरा। कोई मम्मी नहीं, कोई पड़ोसी नहीं, कोई बर्तन नहीं। बस तीन दिन और तीन रातें।”
मैंने सुरेश की तरफ़ देखा। सुरेश ने मेरी तरफ़। और फिर दोनों ने एक साथ सिर हिला दिया।
निधि ने अपना गिलास उठाकर ऊपर किया, जैसे चाय से टोस्ट कर रही हो। “तो तय,” उसने कहा। “अगला हफ़्ता नहीं। परसों नहीं। इसी महीने के आख़िर में।”
“तय,” मैंने कहा।
“तय,” सुरेश ने कहा।
उस रात फिर चुदाई हुई — तीसरी रात, तीसरे दिन में। और इस बार मैंने सुरेश को निधि के साथ बेड पर छोड़ दिया और खुद बराबर के कमरे में चली गई। उस छोटे कमरे में, उस पुराने सिंगल बेड पर, जो अब निधि का था।
वहाँ से मैं दोनों की आवाज़ें सुन सकती थी। सुरेश का गहरा गला। निधि की वो टूटती हुई कराह। बेड की चरमराहट। और फिर निधि का “जीजू, अंदर… अंदर ही…” — वो आख़िरी वाक्य जो पहली रात में भी उसने कहा था।
मैं बेड पर लेटी, छत को देखती रही, और मुस्कुराती रही।
दो महीने पहले मैंने एक बंद दरवाज़ा खोला था। अब मैंने एक खुला घर खोल दिया था। और उस घर में, अब तीन लोग रहते थे — एक पति, एक बीवी, और एक बहन जो अब किसी और के नाम से नहीं पुकारी जाती थी।
वो बस “निधि” थी।
और निधि अब सुरेश की बुर थी — उतनी ही जितनी मेरी।
मेरे हस्बैंड ने मेरी छोटी बहन की बुर चोदी।
पहली बार दरवाज़े पर खड़ी देखती रही।
दूसरी बार बेड पर लेटकर साथ दिया।
और तीसरी बार — तीसरी बार मैंने अपना कमरा ही उसे दे दिया।
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